Friday, 30 December 2011

पत्रकारिता का रंग पीला क्यूँ ....?

" ऊँची कद-काठी ..., इकहरे बदन..., कंधे पर थैला..., माथे पर लाल तिलक...,हाथ में मोटा बंधा मौली धागा..., कमीज़ के खीसे में दो से तीन पेन..., आँखों  में पावर वाला ऐनक ..., हल्के पके सिर के बाल के हुलिए वाले एक शख्स से  आज मेरी मुलाकात हो गई. बाहें, बूढी ज़रूर हो गई हैं पर आज भी इनकी दौड़-भाग छत्तीसगढ़ के आठ जिलों में चलते रहती है. 70 के वय में जावानों की सी स्फूर्ति दिखाने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि अपनी पूरी जिंदगी बतौर मीडिया कर्मी सेवा में झोंक देने वाला भूषण लाल वर्मा है. इस साल वे इसी सेवा में अपनी उम्र की अर्धशतकीय पारी खेल रहे हैं. मूलत: दुर्ग जिले के नंदौरी निवासी श्री वर्मा अठारह साल की उम्र से प्रिंट मीडिया में प्रचार-प्रसार का काम कर रहे है. रायपुर के सप्रे स्कूल में दसवीं तक शिक्षा प्राप्त श्री वर्मा बताते हैं कि दो बार शिक्षा विभाग ने नौकरी का कागज भी आया पर घर की परिस्थियाँ बाहर जाने से रोकती रही सो चाहकर भी गुरजी नहीं बन पाया, फिर पिता स्व. रामलाल वर्मा भी उन्हें अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देना चाहते थे.मां का स्नेह  इन्हें  नहीं मिल पाया.  पैदाइश के दूसरे दिन वो  स्वर्ग सिधार गई. ' स्टेप मदर'  सौतेली मां ने पाला-पोसा. वे आर. एस. एस. से भी नाता रखते है. सरदा वाले मानकचंद जी सुराना की प्रेरणा से उन्होंने न्यू  खुर्सीपार भिलाई में संघ की शाखाएं खोली. छावनी और हथखोज में संध्याकालीन शाखाएं चलने लगी. इसी दौरान रायपुर से प्रकाशित  दैनिक युगधर्म के प्रबंधक स्व. रामलाल पाण्डेय की अनुसंशा पर अखबार के प्रचार- प्रसार का काम मिला, तब से वे इसी लाइन के होकर रह गए. वर्तमान में इनके  परिवार में पत्नी व एक सुपुत्र हैं. इनका पुत्र सेजबहार रायपुर स्थित सरकारी इंजीनियरिंग कालेज में बतौर कौन्सलिंग क्लर्क सेवारत है. श्री वर्मा ने  1961  से 1984  तक युगधर्म, 1988  से 1995  तक नव भास्कर( अब दैनिक भास्कर ) में अपनी सेवाएं दी. सन 1996  से आज पर्यंत वे दैनिक स्वदेश में सेवारत है. आलू-प्याज़ और पान का धंधा उन्हें रास नहीं आया.  90 रुपये माहवारी से काम शुरू करने वाले श्री वर्मा को आज पचास साल के अन्तरालबाद भी महज़ तीन हज़ार रुपये में संतोष करना पड़ रहा है. वे मानते हैं कि  समय के साथ  काफी-कुछ बदलाव आया है. पत्रकारिता आज मिशन नहीं, धंधा होकर रह गई है. पत्रकारिता का पीलापन उभरकर सामने आया है. श्री वर्मा ने प्रतिप्रश्न किया कि " पत्रकारिता का रंग पीला क्यूँ ? " मै निरुत्तर और उनके आगे नतमस्तक हो गया.      











               

Wednesday, 28 December 2011

घोडा घांस नहीं, चना खाता है भाई


तांगे की सवारी का अपना एक अलग ही  मज़ा है. आज बुधवार,  27 दिसंबर को मैने पड़ोसी
जिला मुख्यालय दुर्ग में इसका भरपूर मज़ा लिया . अरसेबाद तांगे की सवारी का मौका मिला.मैने अनुभव किया कि जैसे-जैसे तांगा आगे बड़ता जाता था, वैसे-वैसे घोड़े के गले में बंधी घंटी और घुंघरू बज़ते जाते थे. घोड़े के टापों की आवाज़ के साथ ही एक अलग ही सुरीली आवाज़ लयबद्ध तरीके से मेरे कानों तक आनें लगी थी. मै तो शौकिया तांगे की सवारी कर रहा था पर उसमे बैठे-बैठे सोंच रहा था कि एक समय था,  जब  इसकी सवारी पर लोग निर्भर  हुआ करते थे. इसमे बैठने का अपना एक अलग ही महत्व रहता था. तांगे पर बैठना शान की सवारी समझी जाती थी. अब समय बदल गया है. साईकिल, रिक्शे आ गए. अब तो रिक्शे भी कम हो गए. उनकी जगह ऑटो रिक्शे ने ले ली है. मेरा शहर राजनांदगांव शुरू से ही तांगा विहीन रहा है. दुर्ग के स्टेशन क्षेत्र में ज़माने से तांगे का प्रचलन है. ताकियापारा का तांगेवाला मुनौव्वर कहता है कि ( घोडा, घांस नहीं, चना खाता है भाई  ) घोड़े का चारा " चना " खरीदना भी अब आसान नहीं रह गया है. अब तो पहले जितना लोगों से किराया भी नहीं मिल पाता है. अत्यंत मज़बूरी में ही लोग अब तांगे में बैठना पसंद करते है. वह कहता है कि " पता नहीं लोग अब तांगे में बैठने से क्यों परहेज़ करने लगे है? " इसमें कोई संदेह नहीं कि तांगे की शाही सवारी अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही  है. आगामी पीढ़ी तक शायद ' तांगा ' महज़ भूतकालीन शब्द बन जायेगा. 
   

Monday, 26 December 2011

घुटनों की कोमल त्वचा रक्तरंजित


स्कूल की घंटी बजी. सब बच्चे प्रार्थना के लिए नीयत स्थान पर इकट्ठे हुए. सावधान- विश्राम के साथ प्रार्थना हुई. कक्ष में प्रवेश के साथ ही बच्चों को खाने के लिए चना-मुर्रा परोस दिया गया. गुरूजी ने इतने में ट्रांजिस्टर चालू कर   दिया. बच्चे गाना सुनते हुए चना-मुर्रा का स्वाद लेते रहे. सरकारी प्राथमिक स्कूलों में यद्यपि संगीत शिक्षा नहीं दी जाती पर गुरजी कहता है कि बच्चों को ट्रांजिस्टर सुनाना उनकी पढाई का एक हिस्सा है. दिसंबर के आखरी सप्ताह की शुरुआत होने वाली थी. शीत की भयंकरता भी स्वभाविकतौर पर बढ़ गई है. कक्षाएं जारी थी. घडी के कांटे आगे के घंटे बजा रहे थे. सूरज अपने रास्ते आधे दिन कि दूरी तय करने लगा था. एक बच्चे की गल्ती सिर्फ इतनी थी कि उसने समयपूर्व भोज़न की घंटी बजाने बावत गुरूजी से पूछ बैठा. दूसरे को पिछलग्गू होने का खामियाजा भुगतना पड़  गया. पहले तो दोनों की  धुनाई ( रुई की तरह ) हुई.  बाद का नतीजा सभी देख रहे है. एक ओर भोज़न की सुगंध से स्वादेंद्रिय गुदगुदाने लगी थी तो दूसरी ओर बालू, बाजारी, कंकड़ -पत्थर के छोटे-बड़े टुकड़े, घुटनों की कोमल त्वचा कुरेद रक्तरंजित कर रहे थे. दोनों को तब तक सजा दी गई जब तक स्कूल के बच्चों ने मध्यान्ह भोज़न न कर लिया. अंत में सज़ाप्राप्त बच्चों को दाल-भात खाने मिला. भोजनावकाश के बाद फिर कक्षाएं लगी. अंतरालबाद फिर एक बार बच्चों को चना-मुर्रा खाने मिला.  " टन...टन.. टन...टन..टन...टन.."  की आवाज़ के साथ ही सभी बच्चे ( छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ......छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी )   चिल्लाते  हुए  बस्ता लिए अपने-अपने घर को चले गए. 

Wednesday, 21 December 2011

आखिर कहाँ गई वो गुरुता....?

प्रायः रेडियो और भाषणों में सुनने और लेखों व किताबों में पढ़नें मिलता है कि प्राचीन भारत में नारी का स्थान बहुत ऊँचा था और मुस्लिम आक्रमण के बाद नारी का स्थान नीचे गिरा. एकदम प्राचीन यानि वैदिक युग में नारी का स्थान बहुत  ऊँचा था. भारत प्राचीन काल से अनेक मायने में महान रहा है. इसी भारतीय समाज में गणिकाओं का भी  उल्लेख   मिलता है . भारतीय नारी के आर्थिक अधिकार, महाभारत  व रामायण काल में नारी  का स्थान, संस्कृति  व साहित्य  की अश्लीलता , शुद्र  और नारी का चित्रण , वर्ण  और जातियां  हिन्दू  विवाह , सामाजिक   तथा  सांस्कृतिक,  शिक्षा , चिकित्सा,  विज्ञान निहितार्थ  की बातें  समय - काल के अनुसार  परिवर्तित  होती रही  है. आध्यात्म और विश्व शांति के  प्रयासों के लिए  भारत को विश्वगुरु की संज्ञा भी दी जा चुकी है. यहाँ एक पढ़ी हुई चार पंक्तियाँ प्रासंगिक है -    " भगवान ने मेहनतकश लोगों को भेज दिया... ,अमेरिका ,रूस और जापान...., विश्व को एक नई दिशा देने...., सारे  बुद्धिजीवियों को भेज दिया हिंदुस्तान."  लेकिन कहाँ गई भारत की वो गुरुता....? आज भारत का तंत्र अतिवादियों के इशारे पर चलने लगा  है.  दुनिया के मंदिर में हमारा भारत एक ग्रन्थमात्र होकर रह गया है. विश्व समुदाय का एक शासक " अमेरिका " और सारे देश उपासक हो गए है. पता नहीं,  मुझे क्यों ऐसा  लगता है कि कलयुग में हम सब मशीन हो गये है. दो हाथ, दो पैर, दो आँख से परिपूर्ण शरीर में मस्तिष्क होते हुए भी हम कितने हीन हो गए है...???? 

Tuesday, 20 December 2011

सब कुछ भुला दिया रे..

फेसबुक-फेसबुक खेलते-खेलते रात कब दो बाज़ गए, पता ही नहीं चला. घडी में नज़र गई तो मै सीधे बिस्तर पर चला गया. रात ज्यादा होने से ज़ल्दी आँख भी लग गई. एक बहुत ही अच्छा गाना " कभी बंधन छुड़ा लिया...,कभी दामन छुड़ा लिया...ओं मितवा रे...ऐ...ऐ..ऐ." के बोल की तेज़ आवाज़ ने सुबह ज़ल्दी उठनें मजबूर कर दिया. मैने खिड़की खोल, नज़रें दौड़ाई . नगर-निगम का एक सफाई कर्मी झाड़ू बंधे बांसड़ा लिए गली साफ़ कर रहा था. खर्र र्र.. र्र..र्र.., खर्र र्र.. र्र..र्र..की ध्वनि के बीच कानफोडू आवाज़ वाला मोबाईल अपनी जेब में रखा था. गाने के बोल में मधुरता ज़रूर थी किन्तु आवाज़ की क्वालिटी माशाल्लाह !.....(आप समझ सकते है) ज़ब मोबाईल का चलन नहीं था तो साफ-सफाई करने वाले कर्मी एक ओर लम्बा चमड़े का पट्टा ( बिना संकल वाला )लटकाए रखते थे. चमड़े का ही कव्हर जिसमें बड़ा ट्रांजिस्टर हुआ करता था. फ़िल्मी गानों की धुन उन्हें खर्र र्र.. र्र..र्र.., खर्र र्र.. र्र..र्र. करने उत्साहित करती थी. ऐसा दृश्य देख लगने लगता था कि गाना सुनते हुए काम का अपना अलग मज़ा है. अब ट्रांजिस्टर विलुप्त हो गया है. ढेरों अन्य सुविधाओं सहित पूरी दुनिया माचिस कि डिब्बी ( मोबाईल) में समाई हुई है. यही सोचते हुए मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया.

Sunday, 18 December 2011

बचपन से यह कैसा खिलवाड़..?

मै एक सज्जन से मिलने उनके घर गया . बेल बजाई तो एक नन्हा बालक बाहर आया , कहने लगा --"तिनथे   मिलना है ." मैंने पूछा-" पापा हैं ?" बालक अन्दर जाते हुए कहनें लगा -"देथ ते आता हूँ ." लौटा और कहनें लगा -" पापा तह लहे हैं ति वो धर पल नहीं हैं ." बालक के भोलेपन ने सारा वाकिया बयां कर दिया . मैं लौटनें लगा तो बालक की पुनः पीछे से आवाज़ आई -" अंतल दी छोप-छुपारी था लिदिये ." मै जाते-जाते सोंचने लगा " कितना संस्कारी है, ये बालक !!!
पर उसके भोलेपन के साथ आखिर यह कैसा खिलवाड़ ?????

चलो कोई गीत गुनगुनाएं

दोस्तों, चलिए एक गानें का बोल गुन्गुनातें हैं -" न जाओ सईयाँ , छुड़ा के बहियाँ ....कसम तुम्हारी, मै रो पडूँगी.'' अब एक दूसरे गानें का अंतरा ठीक इसी तर्ज पर जोड़कर गुनगुनाएं ...'' ये हाल मस्ती , मुकुंद बरन जिश, बहार हिज़रा बेचारा दिल है ...'' . न जाओ सईयाँ ...यक़ीनन आप को बड़ा मज़ा आएगा और आप गदगद हो जायेंगे . मेरा दावा है कि किसी कारनवश मुझसे नफ़रत करनें वालों (बहोत कम लोग होंगे ) के चहरे में भी मुस्कान बिखर जियेगी . खासकर तब,  जब रात में नींद नहीं आती रहेगी और आप गुनगुनाओगे तो निश्चितरूप से यकायक मै याद आ जाऊंगा. आप के लिए और (जब आप मुझें बतायेंगें तो मेरे लिए ) वाकई कितना सुखद होगा वह क्षण.

Thursday, 15 December 2011

तख़्त बदल दो, ताज बदल दो........

' रामपाल'  को ज्यादा नहीं तकरीबन  साल भर से नेतागिरी का बड़ा शौक चर्राया...पहले वह छात्र राजनीति करता था. उस समय ज्यादा प्रचार-प्रसार की ज़रूरत भी वह महसूस नहीं करता था. अब वह कालेज के मैदान से निकल समाज व दिन-दुनिया के खुले मैदान में कमर कसकर पूरे जोश-खरोश के साथ उतर चुका है. प्रिंट मिडिया से उसे बड़ी शिकायत है. वो कितना ही अच्छा काम करे कोई भाव ही नहीं देता. स्थापित जनप्रतिनिधियों को छींक भी आ गई तो मयफोटो अखबारों में स्थान मिलने से ' सदाशिव' भी काफी कुपित रहता था. मरीजों को अस्पताल में सड़े-गले फल बाँट कर फल की कीमत से अधिक की फोटो खिंचवाने वालों को मुख्य पेज में जगह दिया जाना  ' ओंकारनाथ ' को  कभी रास नहीं आया. जनहित की बड़ी से बड़ी खबरों को मगरमच्छ की तरह निगल जाने  की प्रवृत्ति  ' सुदर्शन '  को आज भी सालते आ रही है. रामपाल, सदाशिव, ओंकारनाथ और सुदर्शन जैसे दुनिया के करोडो लोगों को अब साइबर क्रांति ने फेसबुक, ट्विटर,  यू-ट्यूब के रूप में अपना खुद का एक पूरा अखबार ही दे दिया है. अपनी अभिव्यक्ति मयफोटो, विडियो देश-दुनिया के सामने प्रकाशित कर सकते है. इसमे कोई संदेह नहीं कि इन माध्यमों से पूरी एक " साइबर फौज " खड़ी हो गई है जो तख्ता पलट का माद्दा रखती है.हाल ही के जनआन्दोलनों में आवाज़ उठाने वाले वर्ग ने  फेसबुक, ट्विटर,  यू-ट्यूब के सहारे अपने आंदोलनों और सरकारीतंत्र के दमनकारी क्रियाकलाप के लाइव विडियो और अघतन जानकारियों को देश- दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाकर जनमत तैयार किया. सोशल मीडिया के रूप एक नई शक्ति ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है. लोग अभी यह नहीं भूल पाए है कि पिछले साल साइबर फौज ने ही मिश्र के तानाशाह होस्नी मुबारक का तख्ता पलट कर रख दिया.   
 

Thursday, 8 December 2011

तलब के बहानें........

पान की तलब ने मुझे बरबस ठेले में रुकने मजबूर कर दिया . जर्दायुक्त पान बनाने कहकर मै इंतजार करने लगा, तभी एक सज्जन हांथ में रेडियो लिये फ़िल्मी गाना " जिया बेक़रार है ....छाई बहार है ....आजा मोरे बालमा ....तेरा इंतजार है ....."सुन रहा था . संचार क्रांति के इस युग में रेडियो सुनते देख लोगों को जरुर अटपटा लगा होगा किन्तु मुझे यक़ीनन वो दिन याद आ गए जब रेडियो पर मै विविध भारती सुनने से कभी नहीं चूकता था . यूं तो यह एक फरमाइशी कायर्क्रम था . लोगों की फरमाइश पर गीत सुनाये जाते थे . इस कायर्क्रम के उदघोषक की आवाज़ के जादू से कौन वाकिफ नहीं है. फरमाइश के क्रम में एक गाँव का नाम प्राय: आया करता था . वह है " झुमरी -तलैया ." मै पहले इस नाम को आयोजकों के दिमाग की उपज समझता था . सोचता था कि कार्यक्रम को रोचक बनाने सायद यह कोई गाँव का कोई छदमनाम है .बहुत बाद में पता चला कि इस नाम का गाँव वाकई में है जो झारखण्ड में स्थित है .गाँव के नाम के अटपटेपन के कारण मै खुद इसका मजाक उड़ाया करता था . आपने क्षेत्र मै भी कई अटपटे नाम वाले गाँव जैसे चोकी मै "मान्डिंग -पिंडिंग" "भगवान् टोला " छुरिया मै "निगनचुआ " कवर्धा (अब कबीरधाम ) के बोडला में "आमाघाटकांदा " जैसे ढ़ेरों नाम वाले गाँव है जो जन्नत से जहन्नुम तक शामिल कहे जा सकते है

खयालों में.....

क्या आपने कभी इस चीज़ का अनुभव किया है कि सुबह-सुबह जिस गानें को सुन लो तो उसी गानें के बोल बार-बार आपकी जुबान पर तब तक आती रहेगी जब तक रात में आपकी नींद न पड़ जाए . बिल्कुल इसी तर्ज़ पर आज मै दिनभर उन वाक्यों के विचार में डुबा रहा जिसे मैंने सुबह ट्रक के पिछवाड़े में लिखा हुआ पढ़ लिया था . हुआ यूँ कि आज जब मै सुबह अपनी मजदूरी में जाने निकला तो देरी की वज़ह से बाइक कि रफ्तार औसत से कहीं अधिक हो गई थी .तक़रीबन एक किमी. का फासला तय कर पाया था कि सामने उसी दिसा में फर्राटे भरता एक ट्रक दिखा . उसके पिछले हिस्से में " बुरी नज़र वाले , नसबंदी करवा ले " लिखा था . यकायक मेरी नज़र उस वाक्य पर पड़ गई . पढ़ा और ओवरटेक कर आगे निकल गया . कुछ ही दूर गया था कि एक डब्लू बी सिरीज़ का दूसरा ट्रक दिखा . इसके पीछे " न नज़र बुरी और न दिल काला , हो सबका भला " लिखा मिला . पढ़कर आगे निकला और चंद समय बाद मै अपने गंतव्य तक पहुँच भी गया. मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त ज़रूर हो गया पर दिनभर इन वाक्यों के "अच्छे-बुरे " विचारों में खो जाने मै मज़बूर हो गया .

मुलाकात....

" फातिमा चची आज भी उसी तेवर में रहती है. मुस्तफा चचा चाय पीते, खाना खाते समय बिलकुल भी बहस नहीं करते. बड़ी मां के साथ इस बार हम ईद की खुशियाँ नहीं मना पाएंगे. दो साल पहले ही वो हम सब को अलविदा कह गई है. जुबेदा फुफ्फी आजकल यहाँ नहीं रहती. शब्बो मुमानी की लड़की मुमताज़ का चेहरा देखे सालों-साल गुज़र गए . ईद में पहले हम ईदी लिया करते थे, अब देने के दिन आ गए हैं." बचपन के एक मित्र से आज बाज़ार में संयोगवश बरसों बाद मुलाकात हो गई. वह बच्चों के लिए ईद पर कपडे खरीदने आया था. बरबस उसकी जुबां से उपरोक्त सारी बातें एक-एक कर निकलने लगी थी. हम ज़ब बाहर खेलते रहते थे, और रशोईघर से चाची " अरे लत्तू ' लतीफ़ ' कहाँ गया रे माटीमिला " चिल्लाती थी तो आवाज़ सड़क तक पहुचती थी . आज ढेर सारी पुरानी यादें ताज़ी हो गई. ईद की मुबारकबाद के ठीक बाद हम दोनों फिर से जुदा हो गए.

आप चाय पियेंगे क्या?

मै ना तो कोई हास्य व्यंग सुना रहा हूँ और ना ही ऐसा लिखना मेरी रूचि है, मै तो यहाँ सिर्फ हकीकत बयां करने जा रहा हूँ. अभी हाल ही में मै पारिवारिक काम से कोरबा गया था. अमूमन मै घर पर ही शेव करता हूँ. बाहर जाने पर ही किसी सेलून तक जाना पड़ता है. एक को निपटाने के बाद उस्तरे वाले का जैसे ही ईशारा हुआ, मै लपककर सिहासन सरीखी कुर्सी में जा समाया. मै ज़ल्दी दाढ़ी बनवा कर मुक्त हो जाना चाह रहा था लेकिन उस्तरे वाले ने अपनी फितरत के मुताबिक दाढ़ी बनाने की तैयारी के साथ ही " कहाँ से आये हो भइया......, आप चाय पियेंगे क्या....., इस शहर में नए दिख रहे है आप ? " जैसे सवालों की झड़ी लगा दी. मै कुछ कह पाता, इसके पहले ही वह कहने लगा-" भइया ज़माना ख़राब है , नए राज्य बनाने के बाद चोरी, लूट, डकैती के साथ ही अब तो अ...पहरण और फिरौती की गूंज भी सुनाई देने लगी है." उस्तरे वाले की मंशा समझकर मैने जल्दी दाढ़ी बनाने और तब तक चुप रहने कहा. हाँ भइया कहकर वह फिर शुरू हो गया. कहने लगा -" कल ही ट्रांस्फोर्ट नगर में दिनदहाड़े उठाईगिरी हो गई. आखिर पुलिस क्या करती है? " वह ऐसे-ऐसे सवाल दागते जा रहा था और जैसे सारे सवालों का ज़वाब वह शायद मुझसे ही चाह रहा हो. दाढ़ी के बनते तक मै लगभग उब सा गया था. दाढ़ी बनते ही मैने उसे एक छोटा लाल नोट थमाया और अपने अस्थाई ठिकाने की ओर बढ़ गया. जाते-जाते मै सोचने लगा था कि आखिर क्या गलत बोल रहा था उस्तरे वाला. कुछ समय तक पुलिस जिनकी गिरेबां पर सीधे हाथ डाल देती थी, राजनीतिक सरपरस्ती के चलते सर से पैर तक अपराध से सराबोर लोग पुलिस के लिए चुनौती बन चुके हैं. पुलिसिंग सिर्फ राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से दम तोड़ रही है. सफेदपोशी की आड़ में आपराधिक पृष्टभूमि के लोगों का गिरोह ना सिर्फ फल-फुल रहा है अलबत्ता आर्गेनाईज्ड क्राइम होने लगे है. आस्थाई ठिकाने का फासला ख़त्म हुआ और मै मेहमाननवाजी करने वालों के साथ व्यस्त हो गया.

खुजली है भई खुजली है .......?

आपने अनुभव किया होगा कि ज़रूरत की कई चीजों की खरीदी हफ़्तों लटक जाती है. उस चीज़ की आवश्यकता के समय अभाव पर गुस्सा आता है. समय टलने के बाद याद नहीं आने के कारण खरीदी लटकती जाती है. अभी बारिश में मै हफ़्तों इसी तरह की बातों से प...रेशान रहा. मुझे अन्तःवस्त्रों की निहायत ज़रूरत थी. नहाने के समय ही याद आता था. बाद में फिर फटे वस्त्र पहनकर यह भूल जाता था कि खरीदना है. बारिश में भीग कर आने के बाद इसी बात को लेकर बड़ा गुस्सा आता था. मज़बूरन गीले और फटे वस्त्र प्रेस कर कई-कई दिन पहनते रहा. अधसूखे कपडे से होने वाली खुजली अलग परेशान करती थी. एक ओर टीबी में " खुज़ली है भई......खुज़ली है ...... खुज़ली है भई.... खुज़ली है. ये इधर भी... होती है ......ये उधर भी होती है , " का विज्ञापन चलते रहता था और दूसरी ओर मेरा हाथ. मैने शनिवार को यह ठाना कि अब तो अन्तःवस्त्र खरीद लेने के बाद ही नहाऊंगा. मै सीधे कपडे की दुकान पहुंचा. दुकानदार को अपनी मांग से वाकिफ करवाने के बाद मै इंतजार करने लगा. दुकानदार मेरी कुछ सुन ही नहीं रहा था. वो एक दिगर काम में व्यस्त था. वो एक शादीशुदा महिला को कुछ साड़ियाँ दिखा रहा था. कह रहा था -" भाभी जी, ये पहन लो.....पूरी प्रतिज्ञा लगोगी. ये क्यों नहीं ले लेते, इसमें तो अक्षरा नज़र आओगी . भाभी जी , ये एक नई साड़ी है सुहाना, आप पर खूब जचेगी, पूनम, प्रफुल्ल, सुहागन,बालिका वधु भी बुरी नहीं हैं. " दुकानदार ने एक-एक कर बनारसी , इटालियन, सिल्क, काटन, कोसा, सिफान, जार्जेट, सिंथेटिक, पेपर सिल्क, सुपर-नेट , हाफ-नेट, ब्रासो, बंधेज सहित ना जानें और क्या-क्या साड़ियाँ बिखरा रखी थी. वह विवाहित महिला अपने पतिदेव के साथ दुकान पहुचीं थी किन्तु फायदे के रिश्ते बनाने में माहिर दुकानदार ना सिर्फ उसे साड़ियाँ दिखा रहा था बल्कि कभी पल्लू बना कर तो कभी चुन्नट डाल कर ऐसी हरकत कर रहा था, जैसे फौरीतौर पर उसकी पहनी साड़ी बदल देगा. मुझसे जब रहा नहीं गया तो मैने उस विवाहिता के पतिदेव से पूछा-" दूकानदार से आपका कोई घरोबा रिश्ता है क्या? " वह कहने लगा- " आपने मेरी दुखती रग को छेड़ दिया है. इस कमीने को तो मै जानता तक नहीं......, साले, दीदी भी कह सकता है लेकिन जब से भाभी जी.....भाभी जी ......कह कर अपना मुंह सुखा रहा है." आखिरकार चिल्लाने पर मेरी मांग की पूर्ति हुई. रुपये देकर मै घर तो लौट गया पर उस दुकानदार की नक्काशी ने मुझे दोपहर दो बजे नहाने का अवसर दिया.

गणेश जी का मूषक काला या सफ़ेद ?

बीते कई दिनों से आसमान में ना सिर्फ बादल छाये हुए है अपितु रोज़ झमाझम बारिश भी हो रही है . शुक्रवार को जब मै सो कर उठा तो घडी में नौ के घंटे बज रहे थे, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे अभी सूरज निकलने ही वाला है. मै बिस्तर से उठ भी नहीं पाया था और बाहर तेज़ पानी गिरने की आवाज़ आई. एक ओर ...जहाँ बाहर बारिश हो रही थी तो दूसरी ओर घर के अन्दर मेरा छह साल का बच्चा " आर्यन " सवालों की बौछार करने लगा था. ' गणेश जी के पापा का नाम क्या है , उनकी मम्मी दुर्गा माँ है क्या, गणेश भगवान सिर्फ लड्डू खाते हैं , उनकी मम्मी उन्हें और कुछ नहीं देती.' जैसे ढेरों सवालों का यथायोग्य ज़वाब उसे मिलाता रहा. जब मै बाथरूम की ओर जाने लगा तभी " पापा...पापा...एक बात और " कहने लगा. अब की बार मैंने उसे डांट लगाई ( स्वाभाविक है , इस समय मै डबल टेंशन में था सो .......आप सब समझ रहे होंगे. ) मैंने कहा - ' जल्दी बोलो.' बच्चा कहने लगा - " पापा, गणेश जी का चूहा काला है कि सफ़ेद ? " मैंने काला बता कर तत्कालीन अपना पल्ला झाड़ते हुए सीधे फ्रेश होने बाथरूम में प्रवेश किया. मै सोंचने लगा था कि आखिर ये अचानक ढेरों सवाल क्यों करने लगा है ? जब मै नहा कर आया तो मेरे बच्चे ने मुझे गणेश जी का दर्शन करवाया, तब सवालों की वज़ह समझ में आई. दरअसल वह रायपुर से प्रकाशित प्रतिष्ठित समाचार पत्र " नव भारत " की पत्रिका
' यंग वर्ड ' के कालम " माय पेंट ब्रश " तहत प्रकाशित गणेश जी के चित्र में रंग भरना चाह रहा था.

ये फूल छाप रावण है भाई ....

बुधवार को सुबह से बच्चे रावण देखने जिद्द कर रहे थे . तैयार होकर मै उन्हें सीधे उस मैदान में ले गया जहाँ रावण बन रहा था. बनाने वाला अपने में मस्त था. मंच वाले, आतिशबाजी वाले, बेरीकेट्स वाले सब अपने कामों में भिड़े थे. रावण का कहीं हाथ ...पैर ...पेट का हिस्सा ...तो कहीं मुण्डियाँ पड़ी थी. मैने रावण बनाने वाले से पूछा -" बहुत मेहनत लगाती होगी भाई इसे बनाने में?" उसने कहा - " हाँ भइया, मै इतनी मशक्कत से दस मुंडी वाला रावण बना रहा हूँ और एक मुंडी वाले ........इसे जला डालेंगे." काम करते-करते वह जारी था. कहने लगा -" भगवान राम ने तो रावण को एक बार मारा और वह मर गया. लोग तो हर साल जलाते और मारते हैं , फिर भी वह नहीं मरता. रामायण में तुलसीदास जी ने भी रावण को मारने की अचूक युक्ति नहीं बताई है. यहाँ तो जो राम दिखता है ....वही रावण निकल जाता है." एक बच्चे ने उत्सुकतावश पूछा- " ये कौन सा रावण है ?" .मै कुछ बताता, इसके पहले ही बनाने वाला कहने लगा- " ये फूल छाप रावण है मुन्ना. रोड के पार दूसरे मैदान में एक दलबदलू रावण मिलेगा. कौरिनभांटा तरफ बड़े मैदान में पंजछाप रावण का कब्ज़ा है. पूरा शहर घूमते जाओ, हाथी....हसिया-हथौड़ा .....और पता नहीं किसिम-किसिम के छाप वाले रावणों के दर्शन हो जायेंगे." रावण बनाने वाले की बातें सुन मै सोचने लगा था-" वाकई चलती रहेगी जिंदगी ..यूँ ही ज़लता और मरता रहेगा रावण .....और चलता रहेगा सिलसिला."

Wednesday, 7 December 2011

' सफ़र '..... 'सफ़र '.... का मज़ा .

अरसे बाद बस से सफ़र का मौका मिला था . मै खुश भी बहुत था . मुझे जाना तो भिलाई था, पर मौसम की बेरुखी और दिनचर्या की थकान ने मुझे बस यात्रा करने मज़बूर कर दिया, सो मै दुर्ग जाने वाली एक मिनी बस में सवार हो गया . बस में कंडक्टर सीट भी भरी हुई थी. इसके ठीक पीछे की सीट में एक गोरा -चिट्टा लड़का अकेला बैठा था . वह हाफ पैंट टाईप कपड़ा पहन रखा था. मैने सीट की ओर इशारा करते हुए पूछा तो " एक और आ रहा है ." का ज़वाब मिला. मै दोनों ओर की सीट के बीच ऊपर की पाइप पकड़ खड़ा रहा. नए बस स्टेंड से निकली बस पुराना अस्पताल तिराहा, ईमाम चौक , स्टेशन चौक, पुराना बस स्टैंड चौक हो कर रायपुर नाके से आगे निकल गई. इस बीच जिसनें भी उस सीट बावत उसे पूछा, सबको वह " एक और आ रहा है " का ही जवाब देते रहा. डेंटल कालेज के पास हाथ के इशारे पर बस ...जैसे ही रुकी, एक कम वय की सुन्दर [आधे कपड़ों वाली] एक लकड़ी बस में सवार हुई. वह कुछ बोल पाती , इसके पहले ही वही लड़का अपनी सीट से खड़ा हो गया और " यहाँ बैठ जाइये " कह कर खिड़की की ओर इशारा किया. पूरी बस की उस एकमात्र सीट पर अब उस लड़की का कब्ज़ा हो चुका था. लड़की शरमाते जा रही थी, क्योंकि हाफ पैंट वाला लड़का खुसुर-फुसुर शुरू कर दिया था. ये नज़ारा { जिन्हें सीट नहीं मिली } वे सब ने देखा. लड़के की मक्कारी सब की समझ में आ गई. वह सभी से ये कहते रहा कि " कोई आ रहा है " लेकिन मामला कुछ और ही था. उस लड़के के शब्द पुर्लिंग से स्त्रीलिंग में तब्दील हो चुके थे. इसी बात की खुली चर्चा बस में खड़े लोगों के बीच शुरू हो गई. अंतत: धक्कम-पेल के मध्य मै गंतव्य तक पहुंचा. बस यात्रा को लेकर मेरी अनुमानित ख़ुशी पूरी तरह से काफूर हो चुकी थी. मेरी कल्पना में यह बिलकुल भी नहीं था कि हिंदी के मायने वाला ' सफ़र ' [बस का ] इंग्लिश मायने वाले ' सफ़र' में तब्दील हो जायेगा

बनाने के लिए बिगाड़ने की जुगत ...

लोगों का आना -जाना जारी था. चूँकि मोहारा रोड में यातायात की व्यस्तता रहती है, अतः छोटी-बड़ी गाड़ियों की लाइन लगी रहती है. इस रोड को दिन-दहाड़े बंदकर निर्माण में लगे लोग अपना काम करने लगे थे. रोड के दोनों तरफ गाड़ियों की लम्बी लाइन लग चुकी थी. एक कई दांतों की लम्बी चोंच वाली विशालकाय मशीन , रोड किनारे के पेड़ को गिराने में जुटी थी. कितना ही बल लग रहा था पर पेड़ गिरने का नाम ही नहीं ले रहा था, इसका कारण यह सामने आया कि काटने वालों ने उसके तनें को पर्याप्त और बराबर नहीं काटा था. तब तक लोग दोनों ओर फंसे हुए थे. करीब घंटे भर तक जब पेड़ धराशाही नहीं हो पाया तो लोग चिल्लाने लग गए थे. रात का काम दिन में कर, लोगों को रोके रखना किसी को गवारा नहीं था. भीड़ में मै भी फंसा था. कई घोड़ों की शक्ति वाली मशीन से पेड़ गिराने का प्रयास देख मै सोंचने लगा था कि राजा-रजवाड़े के समय असली घोड़ों की ताकत " अश्व शक्ति " का इस्तेमाल होता था, यही " अश्व शक्ति " अब " हार्स पावर " में बदल चुकी है . एक मशीन में कई घोड़ों की शक्ति समाई हुई है.

दीपावली में चमका पुराना सोना ......

" अजब संयोग...!!! "

शताब्दी वर्ष के अजब संयोग की तिथि ११ .११.११ को एक और संयोग जुड़ गया है. इस वर्ष का चौथा व अंतिम दुर्लभ संयोग दिन शुक्रवार को एक और संयोग उस समय जुड़ गया जब राजनंदगांव, मोहला विकासखंड के ग्राम पलान्दुर ...की राधाबाई ने गोताटोला के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ११ बजकर ११ मिनट और ११ सेकण्ड में एक स्वस्थ्य बच्ची को जना. कोई चीर-फाड़ नहीं और सुरक्षित प्रसव हुआ. बच्ची का वजन २ किलो सात सो ग्राम है. जच्चा-बच्चा दोनों स्वास्थ्य हैं. नवजात का पिता रामकुमार हल्बा एक लघु कृषक है. इस बच्ची के जन्म के साथ ही छः अंकों की युति अब तिथि के साथ समय मिलकर बारह अंकों की हो गई है.

बाल मेला का उत्साह ......

मेरा बच्चा आज सुबह से इस बात की जिद्द करने लगा था कि पापा आज काम पर मत जाओ, जाओगे तो दो बजे तक आ जाना, नहीं तो मै मारूंगा . सुन कर पहले तो मुझे अटपटा लगा कि ये ऐसा क्यों बोल रहा है. बाद में पता लगा कि उनके स्कूल वाले ईन्द्रपुरी (नगर में स्थित एक आयोजन स्थल ) में बालमेला लगा रहे है. मै अपने काम से आज इसी वजह से जल्दी आ गया. करीब ढाई बजे घर पहुंचा तो वह अपनी मम्मी के साथ बाल मेला जा चुका था. उस बाल मेला का मेरा उत्साह घर आते ही काफूर हो गया था. बाद में मै भी वहां पहुंचा. मेले में स्टाल लगे हुए थे. मुझे लगी थी भूख, चाट सेंटर में कुछ खाने की गरज से पहुंचा . भेल मांगने पर पता चला कि वहां रूपया-पैसा नहीं बल्कि पैसे में ख़रीदा जाने वाला संस्था का कूपन चल रहा था. नगद रख कर भी मुझे स्टाल से भूखा लौटना पड़ गया. बच्चे से मुलाकात हुई तो वह उसी कागज के कूपन से झूला झूल रहा था. बाजू का स्टाल वाला चिल्ला रहा था- "बुड्ढी का बाल ले लो" एक घुमाने वाली मशीन में वह थोड़ी शक्कर डालता था और जब शक्कर के रेशे निकलते थे तो उसे एक कमचिल में इकट्ठा करते जाता था . स्कूल के छोटे बच्चे उसे बड़े चाव से खाते जा रहे थे. बच्चों के मनोरंजनार्थ वहां कई खेल चल रहे थे. अंत में मै पांच रुपये के कूपन में एक पानी पाउच पीकर बाल मेले के अपने उत्साह का परिचय दिया और परिवार सहित घर का रुख किया.

Sunday, 4 December 2011

मुंह की हवा और गानों की सुरीली धुन.........

" जादूगर सईयाँ , छोड़ो मेरी बहियाँ ...., हो गई आधी रात........,  झूठ बोले ...,कौंवा काटे..., काले कौंवे से डरियो......"   " हाय..हाय ये मजबूरी , ये मौसम और ये दूरी ..." जैसे गानों की धुन सुनकर सहसा मेरे भी कदम रुक गए. वहां और लोग भी जुटे हुए थे. बेचने वाला बांसुरीनुमा तूती तुरंत बना भी रहा था. उनका हाँथ तेजी से चलने लगा था. मुंह में तूती लगाकर फूंक की हवा से वह कई तरह के गानों की सुरीली धुन निकल रहा था. वह कोई और नहीं बल्कि भिलाई निवासी जोसब है.  बांस प्रजाति की 'भरुआ' काडी से वह फटाफट तूती बनाते जा रहा था. एक तूती वह बीस रुपये में बेचता है. पुराना दुर्गा टाकिज के पास व मोहरा से उन्हें ढेरों भरुआ काडी मिल जाती है. वह तूती बनाते भी जा रहा था और बीच-बीच में गाने की धुन निकालते हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी करते जा रहा था.   मैने पूछा ...' मुझसे भी ऐसी ही धुन बजेगी क्या..,  क्या , इससे हम भी गानों की धुन बजाना सीख सकते है..?' उनका जवाब मजेदार था. कहने लगे - बिलकुल नहीं . इससे तो बिल्कुल नहीं सीख सकते. क्योंकि ये कुछ देर बाद वैसे ही ख़राब हो जायेगा.  हम तो बच्चों को भुरियाने के लिए ये एक तरह से खिलौना मात्र बनाते है. हाँ कोई यदि बांसुरी से सीखनें की का प्रयास करे तो सुर ज़रूर पकड़ सकता है.    

Wednesday, 30 November 2011

मासूम की अस्मत का लुटेरा ........



जिसे वह फूफा कह कर स्नेह सींचती थी.....,खाने-पीने से लेकर चाय-नाश्ते का  खयाल रखती थी उसी की नज़रें वहशी हो जाएगी...यह सपनें में भी उसने नहीं सोंचा रहा होगा.  बच्ची तो मां-बाप के  पास थी. मां-बाप जैसा कहते थे वैसा वह करती थी. उसके मां-बाप उसे उनके  साथ सुलाते...वह सो जाती थी. दरअसल उस परिवार ने ५७ वर्षीय बंशी बैगा को अपने घर में पनाह दी थी. पांच साल पहले झाड़-फूंक के लिए उसे उस परिवार ने अपने घर बुलाया था, तब से उसका लगातार आना-जाना लगा रहा. बैगा लगभग अब उसी के घर में रहने लग गया था. कभी-कभी वह करमतरा से अपने घर बसंतपुर आ जाता था. बैगा उस परिवार में इतना अधिक घुल-मिल गया था कि जब सब लोग अपने काम पर चले जाते थे तो वह घर में अकेला रहता था. मासूम बच्ची जब स्कूल से आती थी तो उस समय घर में उपस्थित छोटे बच्चों को बैगा कुछ न कुछ बहाने से बहार भेज देता था. अबोध बालिका का शरीर बांध रहा हूँ ( झाड़-फूंक ) कह कर उसकी अस्मत लूटते रहा. घटना के बारे में किसी को कुछ बताने से मना करता था. डर की वजह से उसने किसी  से कुछ नहीं कहा. जब दो माह से बालिका का मासिक धर्म रुक गया तब डाक्टर ने जाँच के बाद जो बताया..उससे घर वालों के कान खड़े हुए. वर्तमान में शिक्षा की कमी , अज्ञानता , सामाजिक कुरीतियाँ ( बैगा ,......झाड़-फूंक ) पालकों और परिजनों की घोर-लापरवाही का खामियाजा एक मासूम बालिका को भुगतना  पड़ा, जिसे मां-बाप ने अति अन्धविश्वास के चलते एक ऐसे हैवान के सुपुर्द कर दिया जिसने उसका बचपन ही ख़त्म कर रख दिया. उस बच्ची का दोष सिर्फ और सिर्फ यह है कि उसका जन्म महिला योनि में हुआ. जिस उम्र में पढाई-लिखाई कर अपना भविष्य सवारने का प्रयास करना था उस उम्र में उसे  समाज के सबसे घृणित स्वरूप से संघर्ष करना पड़ गया. अनजाने में ही सही पर उसके मां-बाप ने ही उसे एक नारकीय गर्त में धकेल  दिया. उसके दादा तुल्य पुरुष ने उसे बर्बाद कर दिया. उस परिवार के साथ विश्वासघात किया. विडम्बना है कि जिन सामाजिक कुरीतियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं ,  ऐसी कुरीतियों से हम ग्रामीण समाज को मुक्त नहीं करवा पाए. अब समय आ गया है कि ऐसी कुरीतियों से समाज और परिवार पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को आगाह कराया जाये ताकि कोई और बालिका या महिला ऐसे तथाकथित बैगाओं के चंगुल से बच सके. इन्हीं बातों की गंभीरता को  उद्घृत करते हुए अदालत ने बंशी बैगा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. अब वह सरकारी रोटी खा रहा है. अदालत ने कहा है कि यह मामला  साधारण नहीं है. पीड़ित बच्ची पर प्रसिद्द कवित्री महादेवी वर्मा की ये चंद पंक्तियाँ चरितार्थ होती है.

मै नीर भरी,  दु:ख की बदरी
विस्तृत नभ का, कोई कोना
                         मेरा न कभी,  अपना होना
                         परिचय इतना,  इतिहास यही
  उमड़ी कल थी, मिट आज चली
मै नीर भरी ,  दु:ख की बदरी !!

Monday, 28 November 2011

मै और मेरी मनोवृत्ति ....



आज जब मै शाम को घर लौटा तो घडी के कांटें साढ़े पांच बजा चुके थे . रोज की तरह चाय की गरम प्याली पेश हुई . मै चाय की चुस्कियां लेने लगा . तक़रीबन इसी समय कामवाली बाई अपना काम करने लगी थी . मैंने देखा कि जैसे बचपने में लड़कियां फुगडी खेलती हैं, ठीक उसी तर्ज पर वह पोछा लगा रही थी. कभी पैर उठाने तो कभी कुर्सी खिसकने से मेरी चाय का मज़ा किरकिरा हो रहा था. इससे मेरी मनोवृत्ति बिगड़ने भी लगी थी. इस बीच मैंने एक और बात पर गौर किया. जैसे-जैसे वह पोछा लगाते जाती थी, उसके मुंह से "सी...... सी.......सी......." की लम्बी सांसो वाली आवाज़ निकलते जा रही थी. क्या आपने ऐसी आवाज़ किसी कामकाजी महिला या युवती के मुंह
से सुनी है? मैंने उत्सुकतावश "ये सी......सी.....सी....." क्या है? पूछ ही लिया. छुई-मुई कि तरह वह शरमाकर रह गयी लेकिन मुझे मेरा जवाब नहीं मिला. मैं यही सोचने लगा "सी.....सी....की आवाज़ शायद काम के बोझ व किसी थकान की वजह से नहीं अपितु कार्य को गति प्रदान करने के लिए उत्प्रेरक स्वरुप मुह से निकलती होगी " इस सम्बन्ध में आप क्या सोचते है???

Sunday, 27 November 2011

सादगी में खूबसूरती की झलक......


न डोली सजी...,न मंडप सजा ....और न दुल्हन के लहंगे के बार्डर से मैच कराती दुल्हे की शेरवानी दिखी .....दुल्हन का लिबास भी कहीं नज़र नहीं आया पर यह जान लीजिए कि मेहमान को फूलों के गलीचे बिछाकर स्वागत करने कि सामर्थ्यहीनता के बावजूद बबूल के इस ठूंठ ने ना सिर्फ अपना सीना चौड़ा किया अलबत्ता बादलों को हरकारा भी बनाया. मकड़ीरानी की स्थिति बिल्कुल उस कन्या सरीखी थी जिसे मायके से ससुराल जाने के बाद अनजाने माहौल में नए रिश्तों को बनाने की चुनौती स्वीकार करनी पड़ती है. मकड़ीरानी ने ना सिर्फ ऐसी चुनौती स्वीकारी अपितु खूबसूरती बिखेरकर यह साबित कर दिया है कि सादगी में भी सुन्दरता बसती है. डूबते सूरज की किरणों ने इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा दिया है. देवरी-बालोद रोड का यह दृश्य मेरी आँखों को भा गया और इसे शब्दरूप देने मै उद्यत होने मजबूर हो गया.

संगीत ऐसा कि पानी भी नाच उठा......


" फूल तुम्हे भेजा है ख़त में ............फूल नहीं मेरा दिल है " , परदेशियों से ना अंखियाँ मिलाना.......परदेशियों को है, ईक दिन जाना ...." जैसे पुराने गानों के बोल के साथ विभिन्न वाद्य यंत्रों से निकलने वाली धुन कानों में सुनाई पड़ने लगी तो आँखें एक और चीज़ देख रही थी. रंगों की इन्द्रधनुषी छटा ...प्रकाशपुंज के रूप में बिखरी हुई थी. छोटे-बड़े आकर के लट्टू वहां जल रहे थे. पानी का फौव्वारा उठ रहा था. ऐसा लग रहा था कि सुर...ताल और लय के साथ पानी नाच रहा हो. मेरी आधी थकान वहीं मिट गई. मै काफी देर तक हरी घांस की चादर में नंगे पांव बैठा, कृत्रिम रंगीनियत का नज़ारा देखता रहा. दिन भर की दौड़-भाग के बाद शाम की बेला थकान मिटाने की होती है . मेरा अलसाया हुआ चेहरा देख कोई भी कह सकता था कि वाकई मै काफी थका हुआ हूँ. शारीरिक थकान मिटाने तो आराम काफी है पर मानसिक थकान मिटाने मेरे कदम आज शाम अकस्मात ही नगर के उर्जा पार्क की ओर बढ गए थे. ये सारा नज़ारा वहीं का है.

फोही ' अन्दर यानी ' मछली ' फंसी.......

मैंने आज तक कभी ' मछली ' नहीं फंसाई. प्रयास किया पर आज भी नहीं फंसी. शिवनाथ पार में आज फगुआ केंवट गरी खेलते मिल गया. उसकी गरी के कांटे में एक ' सांप ' फंसा देख उत्सुकतावश मै भी वहां रुक गया. उसने बताया कि कांटे में फंसा सांप नहीं बल्कि मछली (सांप जैसी प्रजाति की) है . इसे " बाम्बी " कहते हैं.वो मछली हू-बहू सांप लग रही थी. मैने पूछा -मछली इसमें पकडाती कैसे है? उसने बताया कि दंगनी (बांस की छड़ी ) से बंधी तांत ( पतली मोम की रस्सी ) से लगी फोही ( मुर्गी पंखे का आधार वाला हिस्सा ) पानी के अन्दर डूबी तो समझो मछली फंस गई. फोही के अन्दर होते ही दंगनी खींच लो....मछली बाहर आ जाएगी. गरी खेलने की ईच्छा जाहिर करने पर फगुआ ने कांटे में चारा फंसाकर दंगनी मुझे थमाई. बताये मुताबिक फोही का निचला हिस्सा मै पानी में डाला. थोड़ी देर में फोही गोल-गोल घूमकर डूब गई. मैने दंगनी खींची पर.......... ये क्या? फोही और मछली बाहर आने का नाम ही नहीं ले रही थी. खींचने में काफी ताकत भी लग रही थी. " भाई, जल्दी आ ....दो-ढाई किलो की मछली फंस गई है " मैने फगुआ को आवाज़ लगाई. वो भी दौड़ के आया. अपने कपडे निकाल, वो सीधे गहरे पानी में जा घुसा. बाद में पता चला कि मछली-वछली नहीं अपितु गरी का कांटा पत्थर की खोह में जा अटका था. इसके बाद हंस-हंसकर हम दोनों का पेट दर्द करने लग गया था.