Sunday, 27 November 2011

संगीत ऐसा कि पानी भी नाच उठा......


" फूल तुम्हे भेजा है ख़त में ............फूल नहीं मेरा दिल है " , परदेशियों से ना अंखियाँ मिलाना.......परदेशियों को है, ईक दिन जाना ...." जैसे पुराने गानों के बोल के साथ विभिन्न वाद्य यंत्रों से निकलने वाली धुन कानों में सुनाई पड़ने लगी तो आँखें एक और चीज़ देख रही थी. रंगों की इन्द्रधनुषी छटा ...प्रकाशपुंज के रूप में बिखरी हुई थी. छोटे-बड़े आकर के लट्टू वहां जल रहे थे. पानी का फौव्वारा उठ रहा था. ऐसा लग रहा था कि सुर...ताल और लय के साथ पानी नाच रहा हो. मेरी आधी थकान वहीं मिट गई. मै काफी देर तक हरी घांस की चादर में नंगे पांव बैठा, कृत्रिम रंगीनियत का नज़ारा देखता रहा. दिन भर की दौड़-भाग के बाद शाम की बेला थकान मिटाने की होती है . मेरा अलसाया हुआ चेहरा देख कोई भी कह सकता था कि वाकई मै काफी थका हुआ हूँ. शारीरिक थकान मिटाने तो आराम काफी है पर मानसिक थकान मिटाने मेरे कदम आज शाम अकस्मात ही नगर के उर्जा पार्क की ओर बढ गए थे. ये सारा नज़ारा वहीं का है.

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