Thursday, 2 October 2014

तो क्या इस बार रावण को दफनाना पड़ेगा …???"

नौ  दिनों तक माँ शक्ति की पूजा-अर्चना के बाद अष्टमी हवन के साथ ही दशहरा मनाने लोग उत्सुक हैं! 'राम' दल रावण बनाने में जुटा है! विशालकाय रावण बनाया जा रहा है! रावण बनाने वाले 'रामों' में आज अचानक रावणप्रेम कुछ इसतरह छलकने लगा था जैसे अब-तब 'रामों' में रावणत्व जागने ही वाला हो! एक 'राम' कह रहा था-" बारिश की समाप्ति और ठण्ड की शुरुआत के इस मौसम का असर रावण को भी हो गया है! उन्हें सर्दी-खांसी की शिकायत हो गई है! वैसे भी ऐसे मौसम में ज्यादा कढ़ी खाने से नज़ला हो ही जाता है, फिर रावण भी तो कढ़ीप्रेमी रहे हैं! डाक्टर ने कोक, फेंटा, लिम्का, माज़ा, पेप्सी अचार, चटनी, इमली, संतरा, नीबू. दही आइसक्रीम जैसी चीज़ों से परहेज करने कहा है!"  दूसरा 'राम' कहाँ शांत रहने वाला था, कहने लगा-" तभी मैं सोचूं, ये हजारों  का विज्ञापन बोर्ड कैसे ख़राब हो गया, सभी नाक से एक साथ जब बहेगा तो बिन बारिश न सिर्फ बरसात होगी बल्कि बाढ़ भी आएगी!" रामदल में इस बात पर बहस छिड़ गई कि आखिर रावण को सर्दी-खांसी कैसे हो गई? इसकी वजह कोई अंदरुनी वंशानुगत एलर्जी तो कोई धूल-धुंआ-धुंध जैसे उद्दीपकों को बताने से नहीं चूक रहा था! तीसरे 'राम' का सवाल कम मजेदार नहीं था, कहने लगा- "  जलाने से तो हर बार रावण जिन्दा हो जाता है फिर उसे सर्दी भी तो है, तो क्या, इस बार रावण को दफनाना पड़ेगा …???"  तकरीबन इसी दरमियाँ एक बुजुर्ग की आमद हुई! बन रहे रावण को देख वे कहने लगे-" ये क्या पेटू किस्म का बेडौल रावण बना रहे हो, अरे रावण तो ऊँचे कद, तीखे नाक नक्श, और लम्बे बालों वाले थे! उनके ललाट की चमक बताती थी कि वे महाज्ञानी, तंत्र साधक, बेहद आकर्षक, सभी शास्त्रों के जानकार और श्रेष्ठ विद्वान थे! उन्हें तो भगवान राम ने त्रेतायुग में एक ही बार मारा था, तब से लेकर अब तक रामरूप धरे बहुरूपिये 'रावण'  ही रावण को मारते आ रहे हैं!" इतना सुनते ही 'रामों' का रावणप्रेम काफूर हो गया! " जय हो। …!!! " 

Thursday, 18 September 2014

" जब गीली जेब से निकली रुदनी ....!!! "

पानी गिरा …, बाढ़ आई …, चार यार जुटे...., मस्ती के मूड में उछलते-कूदते नहाने के साथ ही बाढ़ का मज़ा ले रहे थे! बाढ़ में बह कर आई  मछलियां, नहाने वालों के नंगे शरीर से टकराकर शरमाती हुई भागने लगी! सभी ने नहाते-नहाते मछलियां पकड़ने की युक्ति लगाई! एक पारदर्शी कपड़े के सहारे अब ये सभी मछलियां पकड़ने में व्यस्त हो गए! देखते ही देखते इनके पास कोतरी...., बिजलू …,टेंगना …,सारंगी …, सहित एक-दो छोटी मोंगरी जैसी मछलियां संग्रहित हो गई! इस बीच कुछ और उत्साहित लोगों की भीड़ वहां बढ़ गई! पकड़ी गईं मछलियों को अब बांटने की बारी आई! यद्यपि सब के सब प्रसन्न मुद्रा में दिखाई दे रहे थे पर मछलियां पकड़ते-पकड़ते इनमे से एक की गतिविधियां शेष लोगों को संदेहास्पद लगाने लगी थी! सवालात भरी नज़रों से उसे ऐसा देख रहे थे जैसे सभी का मौन आग्रह शंका समाधान चाहता हो,  तत्काल तलाशी ली गई तो चड्डे की गीली जेब से रुदनी नामक मछलियां निकलने के साथ ही मछलियां छुपा रखने की पोल भी खुल गई, हा.... हा.... हा...., फिर क्या था, मछलियां गवांने  साथ ही उसे बंटवारे से भी बेदखल होना पड़ गया! 

Friday, 12 September 2014

हाय रे मेरे गुल्लक के 'हीरे' …??? "

" घर में एक सामान ढूंढते- ढूंढते बरसों पुराना एक गुल्लक हाथ लग गया. बिना देरी के उसे जब नारियल की तरह फोड़ा तो  मेरे गुल्लक के 'हीरे' पांच... दस...बीस... पच्चीस, पचास और एक-दो के सिक्कों की शक्ल में मिले! चिल्लहर की भरमार हो गई! आज पूरा बाजार घूम गया, जहां भी चिल्ल्हर के रूप में भुगतान का प्रयास किया, स्वीकार करना तो छोड़ दुकानदार मुझे इस तरह घूरते रहे जैसे मैंने कोई उनकी बेटियां भगा लेने जैसा अपराध कर दिया हो! चिल्लहर के बदले बड़ी मोहब्बत से चाकलेट और चवन्नी छाप पीपरमेंट थमा देने वाले बाजार में खूब चांदी कूट रहे हैं! चिल्ल्हर के बदले कुछ भी गिफिन [ निकृष्ट ] किस्म की चीजों को थम देना वर्तमान व्यवहारिक बजारनीति बन गई है जबकि विधिकतौर पर पांच, दस, बीस जैसे सिक्केयुक्त चिल्लहर पच्चीस रुपये तक स्वीकार करने से कोई मना नहीं कर सकता! यही क़ानूनी बाध्यता है! मित्रों सरकार ने अब तक सिक्कों में सिर्फ चवन्नी यानी पच्चीस पैसे को ही घोषिततौर पर बंद किया है, इस लिहाज से शेष सिक्के प्रचलन में हैं पर व्यवहार में ये सिक्के कहाँ गायब हो गए हैं, ये सरकार और प्रशासन के समक्ष बड़ा सवाल है...??? " 

Wednesday, 3 September 2014

" हिचकोले तो खाने पड़ेंगे प्रभु...!!! "

महाप्रभु श्री गणेश जी से मूषकराज कहने लगा- " सावन तो गया, भादो में बरसाती घटा का साया दिख रहा है ! बारिश का दौर जारी है ! छत्तीसगढ वैसे भी जंगलों से परिपूर्ण है, एक बार घटाटोप बादल इसके उपर छा जाये तो इसकी हरियाली देखते ही बनती है ! हरी-भरी धरती का सुख प्राप्त हो रहा है, इस अदभुत झांकी से अच्छी झांकी और क्या होगी प्रभु ! बहुत मजा आ रहा है! आपकी कृपा से रोज सेव, केला, मौसंबी, संतरे के साथ ही भुजिया, नमकीन का स्वाद लेने मिल रहा है! " प्रभुश्री मुस्कुराते हुए बोले- " ये सब कहने-बोलने की जरुरत ही क्या है ? " मूषकराज जी कहने लगे- " प्रभु, जब आप आराम की मुद्रा में थे तब मै उस ओर निकल गया जो विसर्जन मार्ग है ! मैने देखा, 1 किमी में 500 से कहीं अधिक छोटे-बडे गड्ढे हैं ! उन गड्ढों में पानी भी भरा है जिससे खतरा और बढ़ गया है ! क्या बताऊं प्रभु, मुझे खुद डंका-चम्पा करते लौटना पड़ा ! " मूषकराज की बातें सुन प्रभु ने फिर एक मधुर मुस्कान बिखेरी ! मूषकराज कहने लगा- " आप तो बस मोदक सेवन कर मंद-मंद मुस्कुराते रहिए, पर इतना जान लीजिये कि हिचकोले तो आपको भी खाने पडेंगे ! " मूषकराज की बात समाप्त होते-होते आरती की बेला आ गई, भक्तगण जुट गये और " जय गणेश...जय गणेश...जय गणेश देवा! " के बोल समवेत स्वर में गूंजने लगे...!!! "
" जय श्री गणेश...!! "

Sunday, 27 July 2014

" वो अनसुलझा सवाल ! "

तीर्थयात्रा से अभी-अभी लौटकर आये एक शख्स से आज अचानक मुलाकात हो गई। चाय की चुस्कियों के साथ उन्होंने चर्चा शुरु की। उनकी बातें  सुनकर लगने लगा कि धर्म-कर्म के प्रति शायद उसे वितृष्णा सी हो गई है ! वो कहता जा रहा था, मै सुनता जा रहा था। कहने लगा- " इन दिनों हिन्दू और हिन्दुत्व की चिन्ता खासकर बाबाओं को 'सरकार' से भी ज्यादा होने लगी है। तमाम बाबाओं को प्रणाम करने के साथ ही वह बताते गया कि इसी चिन्ता में बाबाओं की जमात जुटी थी। सिहासन वाले बाबा, 'भगवान' और 'अवतारी पुरुष' का अंतर समझा रहे थे, साथ ही भक्तों द्वारा की जाने वाली पूजा विशेष पर भी वे आपत्ति जता रहे थे। इंतने में 'हवाई जहाज' वाले बाबा भड़क गये, कहने लगे- " हिन्दूधर्म को बर्बाद न करो ! " 'बटलोही' वाले बाबा भी कहां चुप रहने वाले थे, वो कहने लगे- " चरमपंथ को बढावा देना बंद करो। " किसिम-किसिम के बाबा वहां जुटे थे। 'गोली' ( गांजा गली, मानव मंदिर के पीछे ) वाले बाबा अपनी बडी-बडी आखें दिखाते हुए कहने लगे-" किसी के निजी अहंकार के लिए अन्य गेरुआधारियों का इस्तेमाल कदापि बर्दाश्त नही किया जायेगा ।" 'खलबट्टा' वाले बाबा ने अपनी भुजाओं को फड़काते हुए कहा-लोगों की आस्था से खेलना महापाप है।"  'दरघोंटनी' वाले बाबा ने तो साफ शब्दों में यह कह दिया- " संत आते-जाते रहेंगे, भगवान पर लोगों की आस्था बरकरार रहेगी ।" 'दरघोंटनी' वाले बाबा की बातों का समर्थन करते हुए 'चिमटा' वाले बाबा ने अपनी जटा में हाथ फेरते हुए कहा- " कोई भी व्यक्ति किसी की आस्था में हस्ताक्षेप नहीं  कर सकता ।" अब बोलने की बारी काफी देर से चुप बैठे 'मूसर' वाले बाबा की थी, बाबाओं की भीड में अपनी मुंडी ( जैसे ओखली से मूसर निकलता है) निकालकर कहने लगे- " धर्म निजी मामला है, किसी को किसी की आराधना से रोकना हिंसा नहीं तो और क्या है? " अब तक हम दोनों एक प्लेट पापड़ा चट कर चुके थे, दो-दो चाय हो गई थी पर उनका धर्मयात्रा सस्मरण समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था।  मैंने समापन के लहजे का ईशारा किया तो होटल की चर्चा पान के ठेले तक आ गई।  जाते-जाते उन्होंने " आस्था पर तानाशाही आखिर कब तक चलेगी? " का  सवाल भी दाग दिया। वो अनसुलझा सवाल मेरे जेहन में दिनभर कौंधता रहा। 

Wednesday, 23 July 2014

" कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! "

रात की अंधियारी छाई थी! घडी का छोटा कांटा ग्यारह पे तो बड़ा कांटा पांच पे था!  सेकण्ड का कांटा बारिश की फुहारों के चलते मारे ख़ुशी के दो गज उछाल-उछलकर चल रहा था! बाइक से मैं घर लौट रहा था ! गांधी चौक पंहुचा ही था कि एक कुत्ता भौकते हुए ऐसे दौड़ते हुए आया जैसे अब-तब काट ही खायेगा ! उसके पीछे चार-पांच और कुत्तों की तत्काल आमद हो गई! फिल्मों के महानायक धर्मेन्द्र की भांति " कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! " टाइप का कोई डॉयलॉग भी नहीं  मार सकता था! अरे उस समय तो अपनी जान बचने की पड़ी थी! बदहवासी की  हालत में मेरे मुंह से एक बेहद भद्दी गाली [ यहाँ लिख नहीं सकता ] जोरदार आवाज में निकली ! मैंने बाइक वहीँ रोक दी ! कहां अच्छा-खासा सावन की फुहारों का मजा लेते लौट रहा था, कुत्तो ने मुझसे गालियों  की झड़ी करवा दी! मेरे रुकते ही सारे कुत्ते अपनी जगह पर रूककर एकसाथ अपनी राग अलापने लगे थे! अंत में फिर एकबार एक गाली चटकाने के साथ ही बारी-बारी सभी कुत्ते उल्टेपांव भागने लगे! जब सभी भाग गए, तब मैंने राहत की सांस ली! मेरा रास्ता साफ हुआ और मैं आगे बढ़ गया! अब तक का अनुभव यही बताता है कि जब कभी रास्ते में कुत्ते दौड़ाये तो चिल्लाकर आवाज करते हुए रुक जाना चाहिए। भागने की कोशिश की तो समझो कुत्ते अपनी मंशा में कामयाब हो जायेंगे …!!! "   

Tuesday, 17 June 2014

" आये बदरा कारे-कारे...!!! "


चिलचिलाती धूप थी, लू का कहर था, तेज अँधड के बाद जब मिट्टी की सौंधी खुशबू आने लगी तो पतछड में खोया बरगद प्रफुल्लित होकर आहें भरने लगा । लू के थपेडे खाकर अधमरी हो चुकी गौरइया अब सांस लेने लगी है। अब वह धूल स्नान करना छोड़ " छपक-छइया " करने में जुट गईं हैं । चीं...चीं...चीं... की आवाज फिर गूंज उठी और उसकी आँखों में हरियाली सी छा गई । अरे, बादल जो सज-संवरकर आया है और मानो कह रहा हो-" बडे अच्छे लगते हैं ... ये धरती...ये नदिया...और तुमsssss...!!! " संस्कारधानी नगरी राजनांदगाँव के मोहारा जल शोधन व संवर्धन गृह से लगाकर बहती अगाध शीतलता बिखेरने वाली शिवनाथ नदी आसमान मे छाये बादल के ठाठ-बाट को देख ऐसे लजाने लगी थी जैसे कोई नवयौवना अपने प्रियतम के सामने घूंघट सरकाते शरमाती है। लरजकर ही सही पर जैसे कह रही हो-"आये बदरा...कारे-कारे...!!!" दुल्हा सरीखे बन-ठन के पहुंचे बादल के आगे-आगे नाचती-गाती सी बयार ऐसे चलती रही जैसे किसी मधुर धुन में संगत कर रही हो। झुके पेड़-पौधे अब अपनी गर्दन उचका-उचकाकर धूल से कहने लगी थीं कि " चल भाग री करमजली, अब तेरा कौन है यहाँ...!!! " अलसाये पीपल ने भी दो कदम आगे बढ़ कर कारे बदरा की आगुवानी की। मिलन की बेला में लताओं  की जीभ भी लपलपाने लगी थी। बारिश की छोटी-बडी बूंदों ने धरती का श्रृंगार जो शुरु कर दिया है । " जय हो...!!! "

Friday, 13 June 2014

" हाय रे गर्मी .... हाय रे बिजली....!!!"

मेरे हाथ में चाय का प्याला था ! चाय की चुस्कियां लेते अखबार पढने की आदत जो बन गई है! सूरज ने अपनी किरणों का उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया था! परिंदों के चहकने की आवाज़ आने लगी थी! गज़ट पूरा पढ़ भी नहीं पाया था कि बिजली चली गई! बिना पूर्व सूचना के बिजली वालों ने विद्युत प्रवाह बाधित कर आज दिन भर परेशान किया.! सूरज जागकर फिर सोने की तैयारी में था, दरअसल हवाओं के साथ उन्हें पैगाम जो आया था कि अब तुम छुप जाओ... चाँद उतरने वाला है.... सितारे विचरण करने वाले हैं ! परिंदे अपने ठीयों को जाने उद्यत थे! मेरे मोहल्ले की दोपहरी आँखों-आँखों में ही गुज़र गई! दिगर मोहल्ले के लोग नींद भांजकर जाग चुके थे पर बिजली वाले नहीं जग पाये! देरशाम रहत मिली! वज़ह चाहे जो भी हो पर अब सुनने मिल रहा है की बिजली के आम उपभोक्ताओं को बिजली दर में पंद्रह फीसदी करंट लगाने की पूरी तैयारी है! हाय गर्मी .... हाय बिजली....!!!"

Friday, 30 May 2014

" वो शर्मा नहीं उनका नाम 'शर्मा' था...!!! "

चार शर्मा आपस में बैठ कर सामन्य बातें कर रहे थे! बातों ही बातों में आरक्षण पर चर्चा चल पड़ी! यही चर्चा आगे बढ़ कर अच्छी-खासी बहस में तब्दील हो गई! एक शर्मा कह रहा था- " आरक्षण बेहद गंभीर बीमारी से भी घातक है, समय रहते सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो देश की स्थिति और भी बद से बदतर हो जाएगी! " दूसरा शर्मा भी कहाँ चुप रहने वाला था, 90 प्रतिशत  अंक लेने  के बाद भी उनका सुपुत्र इंजीनियर नहीं बन पाया था और इसी आरक्षण की बदौलत 45 फीसदी अंक वाला बाज़ी मार गया था! उन्होंने अपनी खीझ निकलते हुए सवाल किया - " आखिर अवसरों की गैर-बराबरी कब तक चलेगी…??? "  तीसरे शर्मा से भी नहीं रहा गया! वो कहने लगा- " आरक्षण तो संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य प्राप्ति का एक साधन मात्र है, जिसका दुष्परिणाम भी सामने हैं! आरक्षण, कुशलता और उत्कृष्टता पर सीधा हमला ही तो है! प्रतिभा पलायन का प्रमुख कारण है! हमारे देश की  प्रतिभाएं विदेशों में खून-पसीना बहाने लगी हैं! देश सेवा की बजाय विदेश सेवा में जुटीं हैं! देश में सिविल सेवाओं की गिरती गुणवत्ता का कारण भी यही आरक्षण है!" इतना सुनते ही चौथे शर्मा के गुस्से का पारा चढ़ गया! कहने लगा-" समाज के हशियाग्रस्त लोगों को अपनी स्थिति बनाने एक सफल प्रयोग है आरक्षण! "  'आरक्षण की वज़ह से जिन लोगों की जिंदगी हाशिये पर आ गई है उनका क्या…?' के सवाल पर तो वो और भी भड़क कर कहने लगा- ' चुप करो...! तुम सब निर्धन, दलित, शोषित, पीड़ित विरोधी हो! उठा और बुदबुदाते हुए वहां से चलता बना! तीनों को चौथे का अचानक भड़कना समझ नहीं आया पर बाद में पता चला कि वो चौथा शर्मा नहीं बल्कि उनका नाम 'शर्मा' था...!!! 

Tuesday, 27 May 2014

" बजारनामा ....!!! "

 " हाथ ठेले में सब्जियां भरकर " टमाटर, धनिया, मिर्ची, गोभी, भिन्डी, भटा, बरबट्टी वाले...!!! " गलियों में चिल्लाते पहुंचने वाले के पास से ही तकरीबन सप्ताहभर से सब्जियां खरीद कर काम चल रहा था! दरअसल बाजार जाने की मेरी कोताही के चलते ऐसा हो रहा था! घर में आज पूर्वान्ह  जल्दी उठाकर मुझे थैला थमा ही दिया गया! बे-मन गोलबाजार पहुंचा और सब्जियां खरीदने लगा! बाजू में किशोरवय की तीन लड़कियों में से एक ने सब्जी वाले से पूछा- 'टमाटर कैसे दिए...???'  सब्जी वाले ने कहा- ' बीस रुपये किलो…!!!'  ' बाबाजी का ठुल्लू बीस रुपये…! दाम कम हो गया है समझे...!' कहकर खी...खी...खी... करते आगे बढ़ गई! मै सब्जी वाले को और सब्जी वाला मुझे देखते रह गया! ये कैसी संस्कृति और कैसा असर मित्रों....??? " 

Sunday, 27 April 2014

" हां भई... चल रही लहर है....!!! "

लोग कहते हैं, देश मे लहर चल रही है.... अरे तो किसे इंकार है भाई... लहर तो चल ही रही है, पेट्रोल-डीज़ल के दाम लहरा-लहरा के बेतहाशा बढ़ने की... कमरतोड़ महंगाई की... खाली हाथों को काम न मिलने की... पीने के साफ पानी की... रसोई गैस के दाम बढ़ने और किल्लत की... घपलों-घोटालों और भ्रष्टाचार की... या फ़िर रोज बह रहे बेगुनाहों के खून की नदियों की ही क्यों न हो आखिर चल तो लहर ही रही है! कहते हैं, लहरें आवारा होती हैं, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, न्याय, विकास, जोड़-तोड़, देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक तिकड़मबाजी, जहर उगलती जुबां की आवारा लहरें उफान पर हैं! जिन खेतों मे हरी-भरी फसलें लहलहाया करती थीं... उन खेतों मे दरारें दिखने लगी हैं! खेत की दरारें पानी मांग रही हैं पर उसे बून्द भी नसीब नहीं हो पा रह है ! न सरसों का पीलापन दिखता न अलसी की महक आ रही है! खेत उजाड़ और अनाज के गोदाम खाली हो रहे हैं! पालतु पशुओं को हरा चारा क्या सूखा तिनका भी नहीं मिल रह है! बाजार मे बे-मौसम कच्चे-पके आम जरूर बिक रहे हैं पर बेचने वालों को इस बात का तनिक भी एहसास नहीं कि आखिर आम के बौर मुरझाने क्यों लगे हैं...?  इन दिनों एक अजीब तरह की गहमागहमी, हलचल, जी हुजूरी और वोटरों की खुशामद की लहर चल रही है! झूठे वायदों... बड़बोले वचनों और ओछे दावों की लहर के बीच छुप्पन-छुपाई और चुम्मा-चामी से भी कइयों को परहेज़ नहीं हैं! पता नहीं क्यों, सियासी चेहरों की हर लकीरें उनके कमीने इरादों की कहानी बयां करने लगी हैं! जय हो...!!!  

Monday, 14 April 2014

" हुदहुद को "कठफोड़वा" समझने की भूल ...! "

दोपहर  का समय ढल चुका था, सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने लगी थी! मुझे हल्का बुखार लग रहा था, इसका अहसास मुझे घर से निकलने के पहले ही प्याज़ की बदली गंध ने करवा दिया था! सुकून पाने की फ़िराक में मै हरियाली के बीच पहुँच गया! गुनगुनी हवाएं चल रही थी, चिड़ियों का चहचहाना भी जारी था! हल्की गर्माहट के साथ ही नमीयुक्त जगहों पर राहतभरी ठंडकता महसूस होने लगी थी! अचानक मेरे कानों में ठक... ठक... ठक.... की आवाज आने लगी! मैं आवाज वाली आसमानी दिशा की ओर काफी देर तक गौर किया! मशक्कत बाद मैंने देखा, वृक्ष की टहनियों के नीचे तने पर एक लम्बी और नुकीली चोंच वाला पक्षी बैठा है और बार-बार तने पर अपनी चोंच से वार कर रहा है, ठक...  ठकठक.... ठक... की आवाज़ चोंच की चोट से आ रही थी! मै बड़ी उत्सुकता से उसे देखे जा रहा था! काले और सफ़ेद रंग के संयोजन वाला वह पक्षी था! तने की सूखी छाल छिलकर शायद वह कीड़े-मकोड़ों को खाए जा रहा था! मैंने गौर किया कि जब वह पक्षी चोंच की चोट नहीं कर रहा तो भी ठक... ठक... ठक.... की आवाज आती रही! मैने अपनी नजरें दौड़ाई, कुछ दूरी से ही एक नाटे कद और भरे बदन वाला काला सा व्यक्ति दरख्तों सहित मोटे तने की बड़ी टहनी उठाये हुद.. हुद..  हुद.. हुद.. करता जाते दिखा!  समझ में आया कि ये ठक...  ठकठक.... ठक... वाला काम हुदहुद का था, कठफोड़वा तो बेचारा मुफ्त में बदनाम है, दरअसल मैंने ही हुदहुद को "कठफोड़वा" समझने की भूल कर दी थी!  

Thursday, 13 March 2014

" अब की होली टन... टन... टन...!!! "

मुंह लाल... आंखें गुलाबी... और हांथ में पिचकारी लिए जो बच्चे अभी धमाचौकड़ी मचा रहे हैं, ये वो ही बच्चे हैं जो एक दिन पूर्व संध्या ठीक होलिका दहन के वक्त " होली के होकड़ी " चिल्ला रहे थे!मै जब घर से निकला तो मेरे स्वयं के आभामण्डल में कुदरती रंगों की बहार थी. मेरे मन में होली के कृत्रिम रंगों का इंद्रधनुष समाया हुआ था. मै चौराहे पर पहुँच भी नहीं पाया था कि दो हाथ पीछे से आकर मेरे चेहरे को मलने लगे थे. चंद समय में ही मुझे एहसास हो गया कि किसी ने मेरे चेहरे को मोबिल पेंट से पोत दिया है. कोई गोबर खेल रहा था तो किसी को नाली का कीचड़युक्त पानी प्यारा लग रहा था. सभी अपने में मस्त नज़र आ रहे थे. कभी सुनते थे कि भगवान श्री कृष्ण की बंशी होली में बजती थी तो उसकी धुन में राधा बावली हो जाती थी. सात्विक ठिठोली होती थी. " कृष्ण " होली में " राधा " को रंगते हुए अब भी दिखता है. नाम " बृज की होली " भले ही रख दिया जाता है पर अमीर का अहम् और गरीब की संकीर्णता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है. टूटे दिल जुड़ने की बजाय चकनाचूर हो जाते हैं. " रंग में भंग" पड़ने से सूखे कंठ की प्यास नहीं बुझ पाती. खैर, भरपूर मौज-मस्ती के इस पर्व में मेरे मन का " कबीरा " भी फाग गाने-सुनने उद्यत था. मैंने अपने काले-कलूटे मुंह लिए चौराहे पे नजर दौड़ाई। मैंने देखा कि नंगाड़े की थाप पर लोग थिरक रहे हैं.... फाग गूंज रहा है.... ढोल अंगड़ाई ले-लेकर लोगों को अपनी ओर खींच रहा था. बाजू में कुछ लोग अद्धी... पौव्वा …और ठर्रे के साथ मस्त थे तो कुछ लोग जे.....के.... क्यू ...यानी गुलाम, बादशाह और बेगम पर खुलकर दांव लगा रहे थे. होली के मस्तीभरे गीत " रंग बरसे, भीगे चुनर वाली.... होली आई रे कन्हाई,होली आई रे … आज न छोड़ेंगे हम हमजोली, खेलेंगे हम होली... होली खेले रघुवीरा, अवध में होली खेले रघुवीरा... के बोल के साथ ही बच्चे, बूढ़े व जवान मुन्नी बदनाम और शीला की जवानी पर ढिंक चिका … ढिंक चिका … ढिंक चिका करने लगे थे. इन दिनों " तू ने मारी इंट्री यार दिल में बज़ी घंटी यार ...!!! " की धूम है. लगता है, अब की होली " टन … टनाटन.... टन " होगी।

Monday, 10 March 2014

...और बिखर गई मीठी मुस्कान ...!!!


कंधे में स्कूल बैग लटकाये, हाथ में चाकलेट बार का डिब्बा लिये नई नीली जिंस और टोपीदार नीली टी-शर्ट में मास्टर आर्यन शर्मा को देख उनके सहपाठी समझ गये कि आज उनके लिये दिन विशेष है। सब के चेहरे में मीठी मुस्कान बिखरते देर नही लगी। कक्षा-कक्ष में प्रवेश के साथ ही " हैप्पी बर्थ डे टू यू...हैप्पी बर्थ डे टू डियर आर्यन...!!! " की आवाज से वातावरण गूंज उठा । सबने खुशियां बांटी, बाबा आर्यन ने बेहद मीठी अनुभूति के साथ सबको धन्यवाद दिया । स्कूल से लौटकर आर्यन ने बताया कि उनके स्कूल " नीरज पैरेन्ट्स प्राइड " में जिस बच्चे का जिस दिन जन्म दिन होता है, उसे उस परिप्रेक्ष्य में रंगीन वस्त्र धारन की छूट होती है और कक्षा-कक्ष मे सामूहिक खुशियाँ मनाने की परम्परा है । खुशियों का सुहावना अवसर कुछ ऐसा था जैसे सब बच्चे समवेत स्वर में कह रहे हों -
" सूरज रौशनी लेकर आया,
और चिडियों ने गाना गाया
फूलों ने हँसकर बोला
बधाई हो, तुम्हारा जन्मदिन आया...!!! 



Saturday, 8 March 2014

" कोई लाग-लपेट नहीं, एकदम हू-ब-हू ...! "

गाड़ी चल पड़ी थी, मैं दौड़ के चढ़ा, मेरा चढ़ना तो उसका उतरना हुआ। चढ़ते हुए मैने गुटखे की पीक मारी, फिर क्या था, उतरने वाले की पेन्ट और शर्ट छींटदार हो गई। उसका गुस्सा फूटना स्वाभाविक था, वो गालियों की बौछार करने लगा, बस की रफ्तार बढ़ चुकी थी जो मेरे लिये सुकूंनदायक थी। उसकी गालियों की आवाज बस के हार्न की आवाज के आगे दब के रह गई । अपनी गलती के अहसास के साथ ही परिस्थितिजन्य बेहद हसी भी आ रही थी। अब बस अपने गन्तव्य के लिये पूरी रफ्तार से चलने लगी। भीड़ भरी बस की अंतिम सीट से अत्यन्त गम्भीर लहजे में "देख तो दाई, ये रोगहा ह साती-मुडी ल सीथे" की शिकायती आवाज आयी । सब के कान ( खरगोश के कान की मानिन्द ) खड़े हो गये । मनचले (हरकती) की पिटाई भी हुई, कइयों ने " बहती गंगा " में अपना हाथ भी साफ किया । सफर का माहौल शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था । मैने बस के ड्राइवर साहब से कहा- " भइया, संगीत तो शुरु कर दीजिये...? " बस में बैठे कुछ और लोगों ने भी यही गुजारिश की। अब संगीत शुरु हो चुका था पर यह क्या ...? " ओडी विलयाडु पापा " टाइप का गाना बजने लगा था । मैने कहा- " भइया, कोई पुराने और मधुर संगीत सुनाओ...? " उन्होंने निवेदन स्वीकार किया और अगले ही पल हमारे कानों तक " बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी...! झूठ बोले, कौआ काटे...! ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आँखें ...! ये गोटेदार लहंगा...! " जैसे गीत के बोल पूरी क्रमबद्धता के साथ गूंजने लगे । मित्रों , बस की इस यादगार सफर से लौटकर मैं आँन लाइन वही संगीत, वही गाने, वही गाने के बोल सुनने का प्रयास किया पर तनिक भी आनन्दानुभूति नही हुई। कोई बतायेगा...? आखिर ऐसा क्यूं भई...?

Thursday, 6 February 2014

" कलियों और भौंरों के बीच गुफ्त-गू क्यों नही ...???

बाग-बगीचों में फूल अब भी खिलते हैं , खेत-खलिहानों में फसलें अब भी लहलहाती है, चिड़ियों का चहकना भी कम नहीं हुआ फिर भी न जाने क्यों कुछ कमी महसूस होती है! प्रकृति अब लोगों को हँसमुख रहने उद्यत क्यों नही करती ! पुराने रसिकजन बताते हैं कि पहले फूलों को मुस्कुराने कहना भी नहीं पड़ता था और वो खिलखिला पड़ते थे, कोयल की कुहू-कुहू की आवाज कर्णप्रिय लगती थी, बसन्त की दस्तक तब भी होती थी और अपने आगमन का पूर्वाभास भी करवा जाता था, अब तो कब आकर कब निकल लिये पता ही नहीं चल पाता । हरियाली निगलने में गलियों की क्रांक्रीटिंग ने कोई कमी नहीं की है। नाराज फूल मुस्कुराना पसंद नहीं करते । आसमान में बादल जरुर छाते हैं पर मन के आसमान में उदासी बादल क्यों है भाई ? अंतरतम का पपीहा जरुर पुकारता है " पी कहां है....पी कहां है.? पर " तूती की आवाज " हमेशा की तरह नक्कारखाने के आगे दब कर रह जाती है। जीवन की आपाधापी में शायद हम शिकायत, निंदा , धनलोलुपता और विरोध के दलदल में फंसकर रह गये हैं ! " कलियों और भौरों " के बीच अब गुफ्त-गू क्यों नहीं होती...??? आज का बसंत यह बताने मे भी नाकाम लगता है !

Monday, 3 February 2014

" भई, आखिर ये क्या बात हुई ....??? "

मै नई टी शर्ट और नई पैंट पहनकर घूमने निकला! सुबह से शाम हो गई पर किसी ने भी " यू आरलुकिंग स्मार्ट " जैसी बात नहीं की ! सात बजते-बजते बतौर इंसानी फितरत मैंने एक से पूछ ही लिया " ये शर्ट-पैंट कैसी लग रही है? " जाहिर है, जवाब सकारात्मक ही मिला! जबरदस्ती के इस सुकून का अहसास जरुर किया, क्षणिक आनंदित रहा पर अगले ही पल मैं सोचने लगा- भई, ये क्या बात हुई कि किसी ने कह दिया ' अच्छे लग रहे हो ' तो मै खुश हो गया और कोई कह दिया ' तुम्हारी ड्रेस ठीक नहीं है ' तो मैं दुखी हो जाऊं...! क्यों भई...? मैंने तो ठान लिया है, किसी से अब इस तरह तो पूछना ही नहीं है ! हाँ, कोई अपने से पूछ ले तो बात अलग है! कुल जमा सब महसूस करने की बात है मित्रों! मैं तो अब फटी चप्पल और पाजामे में भी ठीक उसी तरह महसूस करने लगा हूँ जिस तरह नए कपडे पहनकर होता है! अब देखता हूँ " हर दिन होली और हर दिन दिवाली " कैसे नहीं होती है! मेरे लिए तो अब हर दिन उत्सव है! मित्रों, क्या आप भी मनाना चाहते हैं ऐसा उत्सव ???