Wednesday, 30 November 2011

मासूम की अस्मत का लुटेरा ........



जिसे वह फूफा कह कर स्नेह सींचती थी.....,खाने-पीने से लेकर चाय-नाश्ते का  खयाल रखती थी उसी की नज़रें वहशी हो जाएगी...यह सपनें में भी उसने नहीं सोंचा रहा होगा.  बच्ची तो मां-बाप के  पास थी. मां-बाप जैसा कहते थे वैसा वह करती थी. उसके मां-बाप उसे उनके  साथ सुलाते...वह सो जाती थी. दरअसल उस परिवार ने ५७ वर्षीय बंशी बैगा को अपने घर में पनाह दी थी. पांच साल पहले झाड़-फूंक के लिए उसे उस परिवार ने अपने घर बुलाया था, तब से उसका लगातार आना-जाना लगा रहा. बैगा लगभग अब उसी के घर में रहने लग गया था. कभी-कभी वह करमतरा से अपने घर बसंतपुर आ जाता था. बैगा उस परिवार में इतना अधिक घुल-मिल गया था कि जब सब लोग अपने काम पर चले जाते थे तो वह घर में अकेला रहता था. मासूम बच्ची जब स्कूल से आती थी तो उस समय घर में उपस्थित छोटे बच्चों को बैगा कुछ न कुछ बहाने से बहार भेज देता था. अबोध बालिका का शरीर बांध रहा हूँ ( झाड़-फूंक ) कह कर उसकी अस्मत लूटते रहा. घटना के बारे में किसी को कुछ बताने से मना करता था. डर की वजह से उसने किसी  से कुछ नहीं कहा. जब दो माह से बालिका का मासिक धर्म रुक गया तब डाक्टर ने जाँच के बाद जो बताया..उससे घर वालों के कान खड़े हुए. वर्तमान में शिक्षा की कमी , अज्ञानता , सामाजिक कुरीतियाँ ( बैगा ,......झाड़-फूंक ) पालकों और परिजनों की घोर-लापरवाही का खामियाजा एक मासूम बालिका को भुगतना  पड़ा, जिसे मां-बाप ने अति अन्धविश्वास के चलते एक ऐसे हैवान के सुपुर्द कर दिया जिसने उसका बचपन ही ख़त्म कर रख दिया. उस बच्ची का दोष सिर्फ और सिर्फ यह है कि उसका जन्म महिला योनि में हुआ. जिस उम्र में पढाई-लिखाई कर अपना भविष्य सवारने का प्रयास करना था उस उम्र में उसे  समाज के सबसे घृणित स्वरूप से संघर्ष करना पड़ गया. अनजाने में ही सही पर उसके मां-बाप ने ही उसे एक नारकीय गर्त में धकेल  दिया. उसके दादा तुल्य पुरुष ने उसे बर्बाद कर दिया. उस परिवार के साथ विश्वासघात किया. विडम्बना है कि जिन सामाजिक कुरीतियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं ,  ऐसी कुरीतियों से हम ग्रामीण समाज को मुक्त नहीं करवा पाए. अब समय आ गया है कि ऐसी कुरीतियों से समाज और परिवार पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को आगाह कराया जाये ताकि कोई और बालिका या महिला ऐसे तथाकथित बैगाओं के चंगुल से बच सके. इन्हीं बातों की गंभीरता को  उद्घृत करते हुए अदालत ने बंशी बैगा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. अब वह सरकारी रोटी खा रहा है. अदालत ने कहा है कि यह मामला  साधारण नहीं है. पीड़ित बच्ची पर प्रसिद्द कवित्री महादेवी वर्मा की ये चंद पंक्तियाँ चरितार्थ होती है.

मै नीर भरी,  दु:ख की बदरी
विस्तृत नभ का, कोई कोना
                         मेरा न कभी,  अपना होना
                         परिचय इतना,  इतिहास यही
  उमड़ी कल थी, मिट आज चली
मै नीर भरी ,  दु:ख की बदरी !!

4 comments:

  1. aisi khabre dil dahla deti hai....aapki ye post saamazik sarokaar ki ek kadi hai
    shiksha bahut zaruri hai aur shayad us se bhi jyadazaruri hai samvedna...

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  2. अमानवीयता की हद है.....
    शर्मनाक....

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  3. han svadh ji, thik kaha aapne...janjagrukata se aesi kuritiyon ko dur kiya ja sakata hai.

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  4. This comment has been removed by the author.

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