Thursday, 8 December 2011

खुजली है भई खुजली है .......?

आपने अनुभव किया होगा कि ज़रूरत की कई चीजों की खरीदी हफ़्तों लटक जाती है. उस चीज़ की आवश्यकता के समय अभाव पर गुस्सा आता है. समय टलने के बाद याद नहीं आने के कारण खरीदी लटकती जाती है. अभी बारिश में मै हफ़्तों इसी तरह की बातों से प...रेशान रहा. मुझे अन्तःवस्त्रों की निहायत ज़रूरत थी. नहाने के समय ही याद आता था. बाद में फिर फटे वस्त्र पहनकर यह भूल जाता था कि खरीदना है. बारिश में भीग कर आने के बाद इसी बात को लेकर बड़ा गुस्सा आता था. मज़बूरन गीले और फटे वस्त्र प्रेस कर कई-कई दिन पहनते रहा. अधसूखे कपडे से होने वाली खुजली अलग परेशान करती थी. एक ओर टीबी में " खुज़ली है भई......खुज़ली है ...... खुज़ली है भई.... खुज़ली है. ये इधर भी... होती है ......ये उधर भी होती है , " का विज्ञापन चलते रहता था और दूसरी ओर मेरा हाथ. मैने शनिवार को यह ठाना कि अब तो अन्तःवस्त्र खरीद लेने के बाद ही नहाऊंगा. मै सीधे कपडे की दुकान पहुंचा. दुकानदार को अपनी मांग से वाकिफ करवाने के बाद मै इंतजार करने लगा. दुकानदार मेरी कुछ सुन ही नहीं रहा था. वो एक दिगर काम में व्यस्त था. वो एक शादीशुदा महिला को कुछ साड़ियाँ दिखा रहा था. कह रहा था -" भाभी जी, ये पहन लो.....पूरी प्रतिज्ञा लगोगी. ये क्यों नहीं ले लेते, इसमें तो अक्षरा नज़र आओगी . भाभी जी , ये एक नई साड़ी है सुहाना, आप पर खूब जचेगी, पूनम, प्रफुल्ल, सुहागन,बालिका वधु भी बुरी नहीं हैं. " दुकानदार ने एक-एक कर बनारसी , इटालियन, सिल्क, काटन, कोसा, सिफान, जार्जेट, सिंथेटिक, पेपर सिल्क, सुपर-नेट , हाफ-नेट, ब्रासो, बंधेज सहित ना जानें और क्या-क्या साड़ियाँ बिखरा रखी थी. वह विवाहित महिला अपने पतिदेव के साथ दुकान पहुचीं थी किन्तु फायदे के रिश्ते बनाने में माहिर दुकानदार ना सिर्फ उसे साड़ियाँ दिखा रहा था बल्कि कभी पल्लू बना कर तो कभी चुन्नट डाल कर ऐसी हरकत कर रहा था, जैसे फौरीतौर पर उसकी पहनी साड़ी बदल देगा. मुझसे जब रहा नहीं गया तो मैने उस विवाहिता के पतिदेव से पूछा-" दूकानदार से आपका कोई घरोबा रिश्ता है क्या? " वह कहने लगा- " आपने मेरी दुखती रग को छेड़ दिया है. इस कमीने को तो मै जानता तक नहीं......, साले, दीदी भी कह सकता है लेकिन जब से भाभी जी.....भाभी जी ......कह कर अपना मुंह सुखा रहा है." आखिरकार चिल्लाने पर मेरी मांग की पूर्ति हुई. रुपये देकर मै घर तो लौट गया पर उस दुकानदार की नक्काशी ने मुझे दोपहर दो बजे नहाने का अवसर दिया.

No comments:

Post a Comment