Thursday, 8 December 2011

ये फूल छाप रावण है भाई ....

बुधवार को सुबह से बच्चे रावण देखने जिद्द कर रहे थे . तैयार होकर मै उन्हें सीधे उस मैदान में ले गया जहाँ रावण बन रहा था. बनाने वाला अपने में मस्त था. मंच वाले, आतिशबाजी वाले, बेरीकेट्स वाले सब अपने कामों में भिड़े थे. रावण का कहीं हाथ ...पैर ...पेट का हिस्सा ...तो कहीं मुण्डियाँ पड़ी थी. मैने रावण बनाने वाले से पूछा -" बहुत मेहनत लगाती होगी भाई इसे बनाने में?" उसने कहा - " हाँ भइया, मै इतनी मशक्कत से दस मुंडी वाला रावण बना रहा हूँ और एक मुंडी वाले ........इसे जला डालेंगे." काम करते-करते वह जारी था. कहने लगा -" भगवान राम ने तो रावण को एक बार मारा और वह मर गया. लोग तो हर साल जलाते और मारते हैं , फिर भी वह नहीं मरता. रामायण में तुलसीदास जी ने भी रावण को मारने की अचूक युक्ति नहीं बताई है. यहाँ तो जो राम दिखता है ....वही रावण निकल जाता है." एक बच्चे ने उत्सुकतावश पूछा- " ये कौन सा रावण है ?" .मै कुछ बताता, इसके पहले ही बनाने वाला कहने लगा- " ये फूल छाप रावण है मुन्ना. रोड के पार दूसरे मैदान में एक दलबदलू रावण मिलेगा. कौरिनभांटा तरफ बड़े मैदान में पंजछाप रावण का कब्ज़ा है. पूरा शहर घूमते जाओ, हाथी....हसिया-हथौड़ा .....और पता नहीं किसिम-किसिम के छाप वाले रावणों के दर्शन हो जायेंगे." रावण बनाने वाले की बातें सुन मै सोचने लगा था-" वाकई चलती रहेगी जिंदगी ..यूँ ही ज़लता और मरता रहेगा रावण .....और चलता रहेगा सिलसिला."

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