आप चाय पियेंगे क्या?

मै ना तो कोई हास्य व्यंग सुना रहा हूँ और ना ही ऐसा लिखना मेरी रूचि है, मै तो यहाँ सिर्फ हकीकत बयां करने जा रहा हूँ. अभी हाल ही में मै पारिवारिक काम से कोरबा गया था. अमूमन मै घर पर ही शेव करता हूँ. बाहर जाने पर ही किसी सेलून तक जाना पड़ता है. एक को निपटाने के बाद उस्तरे वाले का जैसे ही ईशारा हुआ, मै लपककर सिहासन सरीखी कुर्सी में जा समाया. मै ज़ल्दी दाढ़ी बनवा कर मुक्त हो जाना चाह रहा था लेकिन उस्तरे वाले ने अपनी फितरत के मुताबिक दाढ़ी बनाने की तैयारी के साथ ही " कहाँ से आये हो भइया......, आप चाय पियेंगे क्या....., इस शहर में नए दिख रहे है आप ? " जैसे सवालों की झड़ी लगा दी. मै कुछ कह पाता, इसके पहले ही वह कहने लगा-" भइया ज़माना ख़राब है , नए राज्य बनाने के बाद चोरी, लूट, डकैती के साथ ही अब तो अ...पहरण और फिरौती की गूंज भी सुनाई देने लगी है." उस्तरे वाले की मंशा समझकर मैने जल्दी दाढ़ी बनाने और तब तक चुप रहने कहा. हाँ भइया कहकर वह फिर शुरू हो गया. कहने लगा -" कल ही ट्रांस्फोर्ट नगर में दिनदहाड़े उठाईगिरी हो गई. आखिर पुलिस क्या करती है? " वह ऐसे-ऐसे सवाल दागते जा रहा था और जैसे सारे सवालों का ज़वाब वह शायद मुझसे ही चाह रहा हो. दाढ़ी के बनते तक मै लगभग उब सा गया था. दाढ़ी बनते ही मैने उसे एक छोटा लाल नोट थमाया और अपने अस्थाई ठिकाने की ओर बढ़ गया. जाते-जाते मै सोचने लगा था कि आखिर क्या गलत बोल रहा था उस्तरे वाला. कुछ समय तक पुलिस जिनकी गिरेबां पर सीधे हाथ डाल देती थी, राजनीतिक सरपरस्ती के चलते सर से पैर तक अपराध से सराबोर लोग पुलिस के लिए चुनौती बन चुके हैं. पुलिसिंग सिर्फ राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से दम तोड़ रही है. सफेदपोशी की आड़ में आपराधिक पृष्टभूमि के लोगों का गिरोह ना सिर्फ फल-फुल रहा है अलबत्ता आर्गेनाईज्ड क्राइम होने लगे है. आस्थाई ठिकाने का फासला ख़त्म हुआ और मै मेहमाननवाजी करने वालों के साथ व्यस्त हो गया.

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

" तोर गइया हरही हे दाऊ....!!! "

तो क्या इस बार रावण को दफनाना पड़ेगा …???"

" जब गीली जेब से निकली रुदनी ....!!! "