Sunday, 18 December 2011

चलो कोई गीत गुनगुनाएं

दोस्तों, चलिए एक गानें का बोल गुन्गुनातें हैं -" न जाओ सईयाँ , छुड़ा के बहियाँ ....कसम तुम्हारी, मै रो पडूँगी.'' अब एक दूसरे गानें का अंतरा ठीक इसी तर्ज पर जोड़कर गुनगुनाएं ...'' ये हाल मस्ती , मुकुंद बरन जिश, बहार हिज़रा बेचारा दिल है ...'' . न जाओ सईयाँ ...यक़ीनन आप को बड़ा मज़ा आएगा और आप गदगद हो जायेंगे . मेरा दावा है कि किसी कारनवश मुझसे नफ़रत करनें वालों (बहोत कम लोग होंगे ) के चहरे में भी मुस्कान बिखर जियेगी . खासकर तब,  जब रात में नींद नहीं आती रहेगी और आप गुनगुनाओगे तो निश्चितरूप से यकायक मै याद आ जाऊंगा. आप के लिए और (जब आप मुझें बतायेंगें तो मेरे लिए ) वाकई कितना सुखद होगा वह क्षण.

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