Monday, 26 December 2011

घुटनों की कोमल त्वचा रक्तरंजित


स्कूल की घंटी बजी. सब बच्चे प्रार्थना के लिए नीयत स्थान पर इकट्ठे हुए. सावधान- विश्राम के साथ प्रार्थना हुई. कक्ष में प्रवेश के साथ ही बच्चों को खाने के लिए चना-मुर्रा परोस दिया गया. गुरूजी ने इतने में ट्रांजिस्टर चालू कर   दिया. बच्चे गाना सुनते हुए चना-मुर्रा का स्वाद लेते रहे. सरकारी प्राथमिक स्कूलों में यद्यपि संगीत शिक्षा नहीं दी जाती पर गुरजी कहता है कि बच्चों को ट्रांजिस्टर सुनाना उनकी पढाई का एक हिस्सा है. दिसंबर के आखरी सप्ताह की शुरुआत होने वाली थी. शीत की भयंकरता भी स्वभाविकतौर पर बढ़ गई है. कक्षाएं जारी थी. घडी के कांटे आगे के घंटे बजा रहे थे. सूरज अपने रास्ते आधे दिन कि दूरी तय करने लगा था. एक बच्चे की गल्ती सिर्फ इतनी थी कि उसने समयपूर्व भोज़न की घंटी बजाने बावत गुरूजी से पूछ बैठा. दूसरे को पिछलग्गू होने का खामियाजा भुगतना पड़  गया. पहले तो दोनों की  धुनाई ( रुई की तरह ) हुई.  बाद का नतीजा सभी देख रहे है. एक ओर भोज़न की सुगंध से स्वादेंद्रिय गुदगुदाने लगी थी तो दूसरी ओर बालू, बाजारी, कंकड़ -पत्थर के छोटे-बड़े टुकड़े, घुटनों की कोमल त्वचा कुरेद रक्तरंजित कर रहे थे. दोनों को तब तक सजा दी गई जब तक स्कूल के बच्चों ने मध्यान्ह भोज़न न कर लिया. अंत में सज़ाप्राप्त बच्चों को दाल-भात खाने मिला. भोजनावकाश के बाद फिर कक्षाएं लगी. अंतरालबाद फिर एक बार बच्चों को चना-मुर्रा खाने मिला.  " टन...टन.. टन...टन..टन...टन.."  की आवाज़ के साथ ही सभी बच्चे ( छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी ......छुट्टी ...... छुट्टी ...... छुट्टी )   चिल्लाते  हुए  बस्ता लिए अपने-अपने घर को चले गए. 

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