Friday, 19 October 2012

दर्द का एहसास और आंसू की परख


उसकी रोजी-रोटी  का जरिया लकड़ी काटना था. उसी से बुधारू के परिवार का पेट पलता था. दिनभर पसीना बहते लकड़ी काटने से जो रुपये मिलते थे, उससे वह अपने परिवार की जरूरतें पूरी किया करता था. इस पुश्तैनी काम का सिलसिला आगामी पीढ़ी में भी  चलता रहे, इसी प्रत्याशा से बुधारू जब भी लकड़ी काटने जाता, अपने बेटे रामपाल को भी वह साथ ले जाता. अमूमन हर दिन वह अपने बेटे को अपने सामान लकड़ी काटने प्रेरित किया करता था पर रामपाल ने कभी उत्साह ही नहीं दिखाया. जब-जब भी वह अपने पिता को लकड़ियाँ काटते देखता था तब-तब वह कटी लकड़ियों के दर्द का  एहसास अपने जेहन में किया करता था.  एक दिन बुधारू ने उसके हाथ में जबरिया फावड़ा थमाते हुए लकड़ियाँ काटने उसे मजबूर किया. अब दोनों लकड़ी काटने लगे. कुछ देर बाद फावड़े की मार रामपाल के पैर में लगी और वह लहूलुहान हो गया. अपने बच्चे की यह दशा देख बुधारू बिलख पड़ा. रामपाल कहने लगा- "रोने-गाने की जरुरत नहीं है. ऐसा मैने जान बूझकर किया है. मैने स्वयं अपने पैर में फावड़ा  मारा है". बुघारू कहने लगा-" बेटे तुमने ऐसा क्यों किया..? " रामपाल का जवाब था- " मुझे हल्की मार लगाने से आप बिलख रहे है....जरा सोचिये...पेड़ जब काटा जाता है....लकड़ियों पर इससे भी कई गुणा ज्यादा मार लगती है तो उन्हें कितना दर्द होता होगा. जितना दर्द आपको मेरी स्थिति देख हो रही है तकरीबन उसी दर्द का  एहसास पेड़-पौधे भी करते है." बच्चे का जवाब सुनकर बुधारू भी द्रवित हो गया. उसे पेड़-पौधों के दर्द का एहसास और आंसू की परख हो गई. बुधारू ने उसी वक्त इस पुश्तैनी काम को अलविदा कह दिया. अब वह लकड़ियाँ नहीं काटता. उसने परचून की दुकान खोल ली है. 

Saturday, 8 September 2012

अब नहीं पीटेगा वह !

" मेरी क्या गलती है ...मुझे क्यों मार रहे हो...आप जैसा बोलते हैं , वैसा ही तो करते आ रही हूँ....मत मारो...मुझे मत मारो..." इन्हीं चीखों के साथ एक घर के अन्दर से महिला के जोर-जोर से रोने की आवाज़ आ रही थी. बाहर लोगों की भीड़ जुटी थी. हर आने-जाने वालों का वहां रुकना हो रहा था. दरअसल माज़रा ही कुछ ऐसा था कि न चाहते हुए भी लोगों के कदम थमने लगे थे. उनके कुछ पड़ोसी काफी कुछ समझाने का प्रयास कर रहे थे पर पतिदेव मानने तैयार नहीं थे. अपनी पत्नी को बस पीटे जा रहे थे. पड़ोसियों ने जब उससे पीटने का कारण पूछा तो चौकाने वाला जवाब आया. वो कह रहा था-" सोंचा था,  अब की बार लड़का पैदा होगा लेकिन दूसरी बार भी इस करमजली ने लड़की ही पैदा की  है. लड़का होने की प्रत्याशा में मैंने क्या-क्या नहीं सोंच रखा था. जश्न के लिए काफी कुछ तैयारियां  भी कर ली थी किन्तु इसने फिर लड़की पैदा कर सब कबाड़ा कर दिया है. अब इसे पीटूं नहीं तो क्या इसकी आरती उतारूँ. "  वह किसी की बात सुनाने तैयार नहीं था. इस बीच वहां से एक एम्बुलेंस गुजर रही थी. भीड़ देख  ड्रायवर को इशारा हुआ और एम्बुलेंस भी वहां रुक गई. माज़रा समझने चिकित्सा स्टाफ के साथ डाक्टर साहब की भी उत्सुकता बढ़ गई. जब ये उस घर में पहुचे तब भी वह अपनी पत्नी को पीटे जा रहा था. डाक्टर साहब के पूछने पर भी वहशी पति ने अपने पहले वाला ही जवाब दुहराया. डाक्टर साहब हतप्रभ रहा गए. उन्होंने कहा- पीटना बंद करो तो तुम्हे कुछ बताएं. उसने  पड़ोसियों की बात नहीं मानी पर डाक्टर साहब की बातें गौर से सुनने लगा था. डाक्टर साहब ने उसे बताया कि " गर्भधारण  क्रोमोजोम के संयोग से होता है. उन्होंने समझाया- पुरुष के द्वारा X  और Y क्रोमोजोम पैदा होते है जबकि स्त्री सिर्फ  X क्रोमोजोम पैदा कर सकती है. X  और Y क्रोमोजोम के संयोग से लड़का तो X  और X क्रोमोजोम के संयोग से लड़की पैदा होती है. पुरुष ही केवल Y क्रोमोजोम पैदा करता है.  X  और Y के संयोजन से ही लड़का होता है. इस तरह से पति की हमेशा चाहत होती है कि उसे लड़का पैदा हो. यदि परिवार में सिर्फ लड़कियाँ पैदा होती हैं तो पत्नी की कोई गलती नहीं होती है बल्कि इसमे सारा दोष पति का होता है. ये इसलिए कि जो क्रोमोजोम पति की ओर से प्राप्त होता है, उसी वजह से गर्भ के फल का निर्धारण होता है."  पूरी बात सुनने के बाद वह पश्च्याताप की मुद्रा में खड़ा दिखा. उसने सब के सामने संकल्प लिया कि अब वह कभी अपनी पत्नी को नहीं पीटेगा. 

Wednesday, 5 September 2012

कैसा सिस्टम और कैसा सम्मान..?

बाहर से देखने पर तो एक बड़ा दफ्तर लग रहा था. बाहर दफ्तर के नाम का जो बोर्ड लगा था उसमे के कुछ शब्द मिट से गए थे पर 'विकासखंड' लिखा स्पष्ट नज़र आ रहा था. वहां लोग आ रहे
और जाने वाले जा रहे थे. आने और जाने वाले सब के सब चेहरे से शिक्षक लग रहे थे. सामने की टेबल में साहब बैठे थे तो अन्दर हिसाब व लेखा वाला बाबू बैठा था. एक शिक्षक जो सेवानिर्वृत्ति की कगार पे थे, का वहा प्रवेश हुआ. हिसाब बाबू से वे कहने लगे-" क्या बात है, मेरा एरियर्स क्यों नहीं दे रहे हो..... पार्ट फ़ाइनल का आवेदन भी लटका है....रीयेम्बर्स का कोई हिसाब ही नहीं है. ........अग्रिम की अर्जी भी लटकी हुई है." हिसाब बाबू कहने लगा- " ज्यादा चिल्लाओ मत, हमें भी नीचे से ऊपर तक बांटना पड़ता है, तुम्हे क्या , आ गए चिल्लाने....खड़कू बोला था, उसका क्या...? पहले खड़कू फिर बात आगे बढ़ेगी. जमता है तो देखा लो." बेचारा राष्ट्र निर्माता कहलाने वाला शिक्षक अपना सा मुंह लिए उस दफ्तर से बेआबरू यह कहते निकल गया कि आज शिक्षक दिवस है और जिला स्तरीय समारोह में जिन शिक्षकों का सम्मान होना है, उनमे एक नाम उनका खुद का है.  जाते -जाते वो ये सोचने लगा कि आखिर ये कैसा सिस्टम और कैसा सम्मान है ....?

Wednesday, 1 August 2012

' भ्रष्टाचार ' का पौधा

दफ्तर पहुचने में आज उसे देर हो गई थी. उसके हाथ में एक पौधा (जिसकी डाली तोड़ने पर दूध निकालता है ) था. दरअसल साहब की मांग पर ही वह पौधा लाने चला गया था. जैसे ही वह पहुंचा, साहब भड़क गए. ये आने का समय है..., मै कब  से आ कर बैठा हूँ और तुम अभी आ रहे हो..? हाथ में पौधा देख उनका चिल्लाना बंद हुआ. पौधे का मिटटी वाला हिस्सा गीली चिंदी में लपेट देने के निर्देश के साथ ही तत्काल उसका परिपालन भी हो गया. अब,सब अपने-अपने काम में लग गए. दफ्तर का काम-काज ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया था कि एक फरियादी आ धमका. सीधे साहब के पास जाकर उसी बाबू पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने लगा जिसने थोड़ी देर पहले साहब के लिए पौधा लेकर आया था. फरियादी चिल्लाने लगा " आप लोगों को काम के बदले सरकार तनख्वाह देती है, फिर कोई  काम के कैसे पैसे....? ये तो खुला भ्रष्टाचार है." साहब फरियादी की बातों को गौर से सुनने के बाद गुस्साते हुए बाबू को तलब किया. बाबू सफाई देने लगा- " साहब इसमे मेरी कोई गलती नहीं है.  बचपने में मेरे दादा जी, मुझसे बीड़ी जलवा कर मंगवाया करते थे. एक बार जलती बीडी दादा जी तक पहुँचने के पहले ही बुझने लगी थी. मैंने चूल्हे तक दोबारा जाने से बचने बुझती बीडी में दो फूंक मर दी. उस दो फूंक से ही मुझे बीडी की लत लग गई, तब से जब-जब दादाजी बीड़ी जलवाते हैं तो अपना दो फूंक तो बनता ही है." साहब की नाराजगी स्पष्ट झलक रही थी. उन्होंने फरियादी को ठोस कार्रवाई का आश्वासन देकर दफ्तर से रवाना किया. बाहर मिलाने पर बाबू , फरियादी से कहने लगा- " साहब बड़े ईमानदार है. बिना कीमत  के अपना ईमान नहीं बेचते. मगर नेकदिल इन्सान हैं.....कभी मोल-भाव नहीं करते."  बाबू को दफ्तर की कुर्सी बुला रही थी तो फरियादी अपना सा मुंह लिए जिस रास्ते से आया था, उसी रास्ते लौटने मज़बूर हो गया.       

Monday, 11 June 2012

" घुग्घी मां की जय हो.."

एक गाँव..., गाँव की सकरी गली...,गली में करीब चार कमरों का कवेलूदार मकान. बीच का बड़ा कमरा सजा हुआ  था. देवी-देवताओं की तस्वीर के साथ ही नीबू- नारियल का एक तरह से भंडार था वह कमरा. पूजा स्थल से लगाकर एक ऊँची गद्दी लगी थी. उस गद्दी पर बड़ी-बड़ी आखों वाली एक ऐसी महिला बैठी थी जिसके बाल ऐंठनदार थे. भरा हुआ शरीर, ललाट में लाल मोटा और लम्बा तिलक, झक सफ़ेद साड़ी (बाबाओ के बाप के बाप की मां कहलाने वाली मुंबई की ' राधे मां ' की तरह दुल्हन का लिबास नहीं ) उसे और भी भयानक रूप देने अपने आप में पर्याप्त थी. दो सेवक उनकी सेवा में झूल रहे थे. लोग उसे पूरी श्रद्धा से ' घुग्घी मां ' ( उल्लू के सामान बड़ी-बड़ी आंखों के कारण )बुलाते हैं. लोगों का आना-जाना प्राय: लगा रहता है. बदहवास सी एक लड़की को उनके घर के लोग ले आये थे. पता नहीं उस लड़की को क्या तकलीफ थी कि बस बडबड करने लगी थी. सभी ने पहले ' घुग्घी मां ' के चरण छुए फिर देवी-देवताओं की तस्वीर सहित नीबू-नारियल के आगे मत्था टेके. सब के साथ मैने भी वहां अपना शीश नवाया. ऊपर से नीचे तक एक भरपूर नजर मारकर  ' घुग्घी मां ' लड़की के परिजनों की ओर मुखातिब हो गई. पूछा " क्या तकलीफ है बच्चा..?" घर वालों ने बताया " बस रात से खाली बडबड  किये जा रही है. कुछ खा-पी भी नहीं रही है. इसे तो बस आप ही ठीक कर सकती हैं घुग्घी मां."  इतने में  पता नहीं क्या इशारा हुआ तो एक सेवक बाल्टीभर पानी लाकर लड़की के शरीर में उड़ेल दिया. लड़की और जोर-जोर से बडबड करती कूदने-नाचने लगी. एक सेवक " शिव शम्भू ...शिव शम्भू " चिल्लाते आया और लड़की को कस के अपनी बाहों में जकड़ लिया. देवस्थल के धुएं से उसके शरीर की  पूरी सिकाई हुई. ' घुग्घी मां ' ने अपने पास रखे भभूत उसे खाने दिया. करीब घंटेभर बाद लड़की एकदम सामान्य हो गई. उनके घर के लोग "  घुग्घी मां की जय हो...घुग्घी मां की जय हो... " कहते भेंट-चढ़ावा बाद लौट गए.एक दिन वही ' घुग्घी मां ' मुझे एक बड़ी दवा दूकान में दिख गई. उसके साथ एक महिला और एक पुरुष सेवक भी नजर आये. मैने देखा, वो बुखार और दर्द निवारक गोलियों का जखीरा खरीद रही थी. मैने कहा- "  घुग्घी मां की जय हो.."   ' घुग्घी मां ' ने एक प्यारी सी मुस्कान बिखेर दी. उनके सेवकों ने भी कहा- "  घुग्घी मां की जय हो.." मैने पूछा-" आप इन दवाओं का क्या करेंगी..? " घूरती नज़रों ने मुझसे कहा- " क्यों टाइम ख़राब कर रहा है बच्चा, जा तू भी अपना काम कर, हमें भी अपना काम करने दे. " मैने कहा- "  घुग्घी मां " मै तो बस यूँ ही ...." बात ख़त्म हुई नहीं इसके पहले ही बिफरते स्वर मेरे कानों में गूंजने लगे- " इस देश में जब समोसा खिलाकर बच्चे पैदा करवाए जा सकते हैं...., लाल और हरी चटनी से लोगों पर कृपा बरस सकती है तो मेरे ' भभूत ' से क्या कुछ नहीं हो सकता.? " दुकानदार मेरी ओर " क्यों दुकानदारी ख़राब कर रहा है यार की मानसिकता में " देख रहा था.    

Friday, 8 June 2012

'सत्ता' और 'सेना' की संस्कृति

बड़ी खुरदरी खादी की कमीज और खादी का ही पैजामा पहनता है वो. कम से कम दो दिन तो कपड़ा चल ही जाता है लेकिन बीते दो दिनों में उसे कई बार अपने कपडे बदलने पड़ गए.छींक आई तो कपड़ा ख़राब...खांसी आई तो कपड़ा ख़राब. और तो और डकार आने पर भी वही हाल.  रामगुलाम काफी परेशान था. बार-बार दस्त और भूख न लगने की उसे शिकायत थी. घर वालों की सलाह पर उसने एक क्लीनिक की ओर रुख किया. वहां एक आलीशान टेबल लगी थी. उसमे बहुत सारा सामान बिल्कुल व्यवस्थित रखा हुआ था. सामने की कुर्सी में बैठा शख्स अपने गले में नब्ज़ और धड़कन टटोलने वाला यंत्र (स्थेटिस्कोप ) लटका रखा था. मरीज को  देखकर लग रहा था कि उसके शरीर में खून ही नहीं है. पूरा हड्डी का ढांचा लग रहा था वो.उसकी जाँच शुरू हुई. एक तेज रौशनी वाला टार्च जलाकर डाक्टर बोला- मुँह खोलकर फीधे आफ़मान की ओर देखो. जीब दिखाओ. फ़मफ्या क्या है...? फमयबद्ध भोजन  करते हो...? फ़राब पीते हो क्या..? किफ़ी फमारोह के फमागम में तो नहीं गए थे..? रामगुलाम ने सवालों के  यथायोग्य जवाब देते हुए दस्त न होने और भूख न लगने की परेशानी बताई. जाँच-परीक्षण बाद डाक्टर ने कहा- " एक-एक गोली फुबह-फ़ाम खाना. ब्लड प्रेफ़र और फुगर की जाँच करवा लेना. अब  फ़राब का फ़ौक मत पालना. इफ फीफी में मधुरफ है, इसे फ़रबत फ़मझ के मत पी जाना. दवा की खुराक के फाथ दो-दो चम्मच पीते जाना.  दवा खाने और परहेज के बाद भी फेहत में कोई फुधार न दिखे, और कोई फमफ्या खड़ी हो जाये तो पूरी फ़ीफ़ के फाथ और आ जाना. रामगुलाम जम्हाई लेने लग गया. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. इतने में " ही...ही...ही...ही...ही..." हंसी की आवाज आई.   पीछे खड़ा क्लीनिक का सेवक  हंस रहा था. सौ का फ़ीस देकर जब रामगुलाम क्लीनिक से जाने लगा तो सेवक ने कहा -" ऐसा ही होता है. यहाँ जो एक बार आता है वो दुबारा नहीं आता. कुछ समझ में नहीं आया न, दरअसल साहब ' स ' को ' फ ' बोलते हैं."  बताते चलें, एक बार प्रशासनिक ओहदे के अफसर के घर उनके रिश्तेदार के साथ जाना हुआ. बड़ा बंगला था. बड़ा सा फाटक लगा था. दरबान अपनी ड्यूटी बजा रहा था. लाँन से लगा गार्डन हरे-भरे पौधे और फूलों से सजा हुआ था. पोर्च में पीली बत्ती वाली गाड़ी खड़ी थी. हम समझ गए कि साहब घर पर ही हैं.सूचना हुई, बुलावा आया और हम वहां पहुचे. चूँकि मेरे साथ वाला उनका रिश्तेदार था इसलिए स्वागत  भी अच्छा हुआ. नाश्ता आया फिर चाय आई. दोनों में लम्बी घरेलू बातें होती रही तब तक मै गुटखा चबाते लाँन में टहलता रहा. मै लौटा तब तक बातें चल ही रही थी. साहब कह रहे थे- "तुम तो जानते हो, मेरी माँ ने मुझे 'सेना' बेच-बेचकर पढाया-लिखाया है. आज उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि मै इस जगह पर हूँ"  इस बीच साहब की बेटी कहीं जाने निकल रही थी. उसे देख  साहब कहने लगे-"बेटा, जून का महीना है, घूप तेज है, कपड़ा तो रख ही लो और इनदिनों अब दोपहर के बाद जब भी निकलो 'सत्ता' जरुर रखो." वहां  से विदा हो जब हम जाने लगे तो मैने अपनी जिज्ञासा शांत करने साथ वाले मित्र से कहा- यार, ये पढाई-लिखाई के साथ 'सेना' और जून का महीना और धूप के साथ 'सत्ता' का क्या सम्बन्ध है?" जवाब आया- " असल में साहब छेना को 'सेना' और छत्ता को  'सत्ता' बोलते है."    

Saturday, 2 June 2012

चूभती हंसी....!

" बातों से लग तो पूरा संपादक रहे हो लेकिन संपादकों सी मक्कारी कहाँ से लाओगे. हाँ....हाँ..( राजेश शर्मा ) बिल्कुल यही नाम था उस मक्कार का. विज्ञापनों में कहीं कोई कमी नहीं की. जगह-जगह उसने स्कूल खोला. लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने शक्तिमान (मुकेश खन्ना ) और बालीवुड कलाकार ( गुफी पेंटल ) को खुली जीप में गली- गली घुमाया. एक लाख एकमुश्त लेकर मेरे बच्चे की बारहवीं तक शिक्षा की गारंटी दी थी. मेरे जैसे न जाने और कितने छत्तीसगढ़ियों से अरबों वसूला. एक दैनिक अखबार (नेशनल लुक ) भी निकला जो हमारे एक पूर्व संसद की तरह बड़ी तेजी से उभरा था. समाचार लिखने वाले नौकरों ( साँरी  रिपोर्टरों  ) को दोगुनी-तिगुनी मजदूरी में बड़े अखबार ग्रुप से तोड़कर लगाया. बाद में ये ' घर के रहे न घाट के ' वाली स्थिति में आ गए. ' डाल्फिन ' को तो उसने बिना पानी के सागर में तैरने छोड़ दिया और पूरी झांकी के साथ ' नॅशनल लुक ' निकालने वाला अब लुका-छिपी का खेल, खेल रहा है."  एक साँस में वह न जाने और क्या-क्या बके जा रहा था. शायद मैंने यह कहकर उसकी दुखती रग को छेड़ दिया था कि मै भी अब अखबार निकालुंगा और नाम होगा " गोबर टाइम्स." एक पुराने मित्र टिलेश्वर (हम आज भी उसे टिल्लू बुलाते हैं ) से आज स्टेशन में अचानक मुलाकात हो गई. वो मंत्रालय में अपनी ड्यूटी बजाता है. बच्चों की छुट्टी चल रही है. इन दिनों फेमिली के पास रहने उसे अप-डाउन करना पड़ रहा है. उसने सवाल किया- " ये अचानक अखबार निकलने का कैसे सोंच लिया? मैंने कहा-  " ताकि मै देश के लोकतंत्र की ईमारत को मजबूत,चिरस्थाई, ईमानदार और पारदर्शी बनाने में अपना योगदान दे सकूँ. 'गोबर टाइम्स' के माध्यम से सच को सच कहने का प्रयास करूँगा. लोगों की आवाज बनूँगा. समाज को नई दिशा देने की कोशिश होगी." इतना कहते देर न लगी कि टिल्लू की उपहासजनक हंसी से स्टेशन परिसर गूंजने लगा. सुई की भांति चूभन वाली हंसी का अहसास कर मुझे लगा की शायद मेरे सहनाम वाले की करनी का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ रहा है. हम वहां से निकल पाते, इसके पहले एक लाठी टेकती बुढिया " सीढ़ी पार करवा दे बेटा " कहते पहुंची. हम दोनों ने मिलकर माताराम को हांथों का क्षणिक सहारा दिया. उनका धन्यवाद् बटोरकर हम दोनों भी अपने-अपने रस्ते हो लिए.     

Monday, 28 May 2012

" काम ज्यादा और कम मजदूरी "

मई का मौसम...., आग उगलता सूरज...., हाय रे गर्मी. हर तरफ सन्नाटा पसरा था. गर्मी और लू के थपेड़ों ने दिन में बाहर निकलने ख़बरदार कर रखा था फिर भी मुझे आज इमरजेंसी में निकलना पड़ गया.यद्यपि आसमान में बादल छाये हुए थे तथापि उमस बढ गई थी. कभी धूप तो कभी छांव की स्थिति थी. इसका कारण सिर्फ और सिर्फ यह  था कि नवतपा के बाद भी बीती शाम घने बादल छाये थे और रात बूंदाबांदी हुई थी. आप  समझ सकते  हैं  कि इससे तापमापी का पारा जरुर गिर गया होगा पर उमस की परेशानी बरक़रार थी. मै जिनसे  मिलने गया था, वो तो नहीं मिला पर उसी मोहल्ले में लुंगी- बनियान पहने एक शख्स अपनी देहरी पर खड़े जरुर मिला गया. हाँथ का इशारा हुआ और मेरा दाहिना पैर बाइक का ब्रेक दबाने में व्यस्त हो गया. जब गाड़ी रुकी तो मैंने मुंह से लेकर कान और नाक तक लपेटा हुआ पंछा हटाया. आँखों पर पड़े काले शीशे का ऐनक निकाला. मेरा चेहरा देख लुंगी-बनियानधारी ने मुझे गले लगा लिया. वो मेरा सहपाठी निकाला. जब पढ़ते थे तो खूब शरारत किया करते थे, नगर निगम और राजीव फैन्स क्लब से बल्ब चुराकर बेचना और मिलने वाले पैसे से गुटखा-पान की तलब पूरी करना अपनी दिनचर्या में शामिल था.अब वह पुलिस बन गया है.  उसने जिद्दकर अपने घर में बैठने मुझे मजबूर कर दिया. धूप से सीधे अन्दर कमरे में गया तो मेरी आँखें चौंधिया सी गई थी. कुछ देर तक अँधेरा छाया रहा. तीन गिलास मटकी का ठंडा पानी हलक से नीचे जब उतरा तब राहत मिली. चाय की जगह छांछ पर सहमति बनी. किचन में तैयारी चल ही रही थी कि बेल बज़ने लगी. छांछ भरे गिलास परोसकर उनकी श्रीमती ने दरवाजा खोला. सामने लम्बे बालों वाली एक लड़की खड़ी थी. हाथ में नोटपैड और कंधे में बैग लटक रहा था. आगंतुक का भी सत्कार हुआ. हम सब छांछ का मज़ा लेने लगे.  इसबीच " आपकी शादी कब हुई...? बच्चे कितने है...? किस-किस उम्र के  है...?  ऐसा क्या...कौन सा महीना चल रहा है....? चेक-अप किस डाक्टर के पास करवा रही हो...? सोनोग्राफी करवाई  क्या..?  डेट कब का मिला है...?" लड़की सवाल पर सवाल किये जा रही थी. एकदम अटपटे सवालों की झड़ी होने लगी. हमें लगा, ये कोई महिला स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता होगी और " जच्चा-बच्चा " जैसे किसी कार्ययोजना को लेकर निकली होगी. मैंने पूछ ही लिया " आप नर्स है क्या..?" जवाब चौकाने वाला था. दरअसल वो एक निजी स्कूल की वर्कर है और संचालक ने उसे न सिर्फ भर्ती अभियान में लगाया है बल्कि किनके घर कब बच्चा पैदा होने वाला है, की जानकारी भी जुटा रखने की जिम्मेदारी दे रखी है. उसका कहना था कि घर-घर घूमने के अलावा उन्हें महिला रोग चिकित्सक से लेकर निजी नर्सिंग होम्स में भी चक्कर लगाने पड़ते है. मैंने कहा-" तब तो अच्छा पैसा भी मिलाता होगा..?" जवाब आया- " नहीं भइया, हम जैसे मज़दूरों की अपनी मज़बूरी है, काम ज्यादा और कम मजदूरी है."                

Wednesday, 25 April 2012

मै क्यों बताऊँ ?

शहर के मध्य एक चौक है. लोग इसे भदौरिया चौक के नाम से जानते है. इसी चौक के बाजू में एक चाय का होटल है. चाय की तलब लगी. मै भी उस होटल तक पहुँच गया. वैसे यहाँ असामान्य व्यक्ति ज्यादा दिखते  हैं. मैने होटल वाले से चाय मांगी. चाय मुझे मिल पाती, इसके पहले उस व्यक्ति पर मेरी नज़र पड़ी जो हाथ में अखबार लिए, उसमे छपे समाचारों को जोर-जोर से पढ़कर लोगों को सुना रहा था. मैने उससे पूछा-" कौन सा अखबार है?" उसने चेहरा घुमाकर आँखें दूसरी ओर कर ली.( जैसे उसके अपने काम से शायद खलल पड़ी हो) उनकी ओर से कोई जवाब तो नहीं आया पर वो जारी रहा. उसमे छपी एक खबर को वह चटखारे ले-लेकर लोगों को बता रहा था. मैने भी सुनी.  खबर थी-"...और जीत गई जिंदगी." खबर का सार यह था कि एक युवक ने अपने घर के कमरे में लगे पंखे के सहारे फंसी लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया. जैसे ही वह उसमे झूलने की कोशिश की, रस्सी टूट गई और मौत ने उसे धोखा दे दिया. इस तरह से जिंदगी जीत गई और मौत को शिकस्त मिली." इस बीच मेरी चाय भी आ गई और मै चुस्कियां लेने लगा. वो अब मेरी ओर मुखातिब होते हुए प्रतिप्रश्न किया-" हाँ भईया, क्या कह रहे थे?" मैने उससे फिर पूछा-" कौन सा अखबार है?" जवाब आया-" भास्कर भूमि." मैने कहा- " कहाँ से निकलता है." उसने अखबार का आखरी पन्ना पढ़कर बताया-" भईया, इसमे तो 'कौरिनभांटा रोड, बाबा फतेसिंग हाल के सामने हरिओम काम्पलेक्स' से प्रकाशित लिखा है" हमारी बातचीत चल ही रही थी कि होटल के पीछे से "ये तो बनारस का रसगुल्ला है, ये तो चिकनी ज़लेबी है,  अरे ये तो इलाहाबाद की रबडी है भाई." की आने वाली जोर की आवाज़ ने हम सब ध्यान खींच लिया.उस होटल में कई दर्ज़न लोग नियमित चाय-नाश्ता करते है. आवाज़ की दिशा में नज़रें दौड़ाई तो कुछ लोगों को गोल घेरे में बैठे देखा. हर कश में ऐसी आवाज़ निकल रही थी.  उनमें से एक को तो मै जानता हूँ. बीडी..सिगरेट...तम्बाखू को तो वह हाथ तक नहीं लगाता लेकिन गांजे की चिलम (सुट्टा ) फूंके बिना वह घर से नहीं निकलता. दिखने में तो एकदम गऊ पर सियार की धूर्तता है उसके अन्दर. दरअसल उसी ने वहां अपनी महफ़िल जमाई थी. वहां खूब हल्ला-गुल्ला हो रहा था. शरीर में पहने हुए कपड़ों के आलावा उसके गले में एक अंगोछा लटक रहा था. वहां से उठकर उसी अंगोछे से अपना मुंह पोछते हुए होटल पहुंचा. गरम चाय, एक घूंट में ही गटकने के बाद बाजू के ठेले में पान खाया. चौक तक जाकर प्रतीक्षा सीट में बैठ गया. पान की पीक उसने सामने के बोर्ड में उड़ेल दी. मैने सब देखा. पर मै किसी को उसका नाम क्यों बताऊँ? दो सौ चक्कर काटकर मुझे नहीं चाहिए दो सौ रुपये.  

Monday, 23 April 2012

'शाहरुख' के 'दर्द' का एहसास



दोस्तों  की जिद्द पर मै  भी चार पहिया की एक सीट में समा गया. कार सीधे राजधानी की ओर फर्राटे भरने लगी. शिवनाथ पुल पार करें और पुलगांव के पहले ठाकुर ठेला में न रुकें, ऐसा संभव नहीं. चाय-नाश्ते के बाद आगे निकले तो कार सीधे रायपुर रिंगरोड होकर 'मेंगनेटो' में रुकी. हम कार समेत मॉल के आधारतल में पहुँच गए क्योकि पार्किंग व्यवस्था वहीँ थी. वहां से उत्तोलक (लिफ्ट) माध्यम से एक, दो करके तीसरे माले पर पहुंचे. एक गार्ड वहां हम सब की जेबें टटोलने लगा. बड़ा अटपटा लगा. हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे. गार्ड ने बड़े अदब से 'सिक्युरिटी रीज़न बौस' कह कर अपना काम कर लिया. हम वहां रनिंग लेडर (चलने वाली आटोमेटिक सीढ़ी) से चढ़ते-उतरते घूमते रहे. 'सुई' से 'सब्बल'  और 'नमक' से 'मुरब्बा' तक की दुकान वहां सजी थी. दोस्तों की इच्छा अब वहां आलीशान टाकीज में फिल्म देखने की हुई. साथ थे, इसलिए न चाहते हुए भी घुसना पड़ा.टिकट लेकर अन्दर जा ही रहे थे कि सामने एक सिक्युरिटी फ्रेम दिखा. उसमे से होकर गुज़र ही रहा था कि फिर एक बार मेरी जेब टटोली जाने लगी. इस बार मुझे स्वाभाविकतौर पर गुस्सा आया. मैंने गार्ड से कहा-" न तो ये न्यूयार्क का हवाई अड्डा है और न मै शाहरुख खान, फिर क्यों है ये ताम-झाम ?" गार्ड हाज़िर जवाब निकला. कहने लगा- " भईया, शाहरुख़, सलमान, या फिर आमिर खान ही क्यों न हो, चेहरा देखनेमात्र से किसी के निर्दोष होने का प्रमाण मिल जाता तो बात ही क्या है." हमारी इस बातचीत का आजू-बाजू वालो ने ठाहकेदार मज़ा ज़रूर लिया पर गार्ड का ज़वाब मुझे कई बातों पर सोचनें मज़बूर कर दिया. हम मॉल संस्कृति में चार से पांच घंटे तक समाये रहे. लौटते वक्त दोस्तों की इच्छा शेर-भालू देखने की हुई. कहते हैं  "शेर देखना भी है और डर भी लगता है तो जंगल नहीं जाना , किसी पिंजरे के शेर को देख लेना  चाहिए" सो हम सीधे भिलाई के मैत्री गार्डन पहुँच गए. शेर पिंज़रे में फलाहार कर रहा होगा और भालू की बदबू से मै पहले से ही वाकिफ था, इसलिए दोस्तों ने शेर-भालू देखा, तब तक मै पेड़ की  एक शाखा में आराम फरमाते रहा पर चैन नहीं मिल पाया. शाहरुख खान को तो अमरीका के एक हवाई अड्डे में महज़ कुछ घंटे रोका गया, मेरी तो अपने ही प्रदेश की राजधानी में खुलेआम जेबें टटोली गई. शाहरुख़ इतने महान कलाकार, उनके आगे मेरी क्या बिसात पर मुझे गुस्सा आ सकता है तो उनके दर्द का एहसास तो मै कर ही सकता हूँ. पेड़ की शाखा में लेटे-लेटे मै सोचने लगा था कि जब ताज पर तांडव हो सकता है, संसद पर हमला हो सकता  है, न्यायलय परिसर में विस्फोट हो सकता है, संसद के अन्दर नोटों की गड्डियां उछालने वालों का सम्मान होता हो और सलाखों के पीछे का आदमी जहाँ मंत्री बन जाता हो, ऐसा  देश अपने आप में महान है. जिस प्रदेश में कलेक्टर दिन-दहाड़े अगवा कर लिए जाते हों वहां इतनी सतर्कता और सजगता तो होनी ही चाहिए.दोस्तों की आवाज़ से मेरी एकाग्रता भंग हो गई, इसी के साथ मै पेड़ की शाखा से उतर गया.  हम लौट आये. जय हिंद.... जय भारत....जय छत्तीसगढ़....कह कर मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया.  














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Tuesday, 10 April 2012

व्यवस्था है भाई, चलने दो........

कहते हैं, कहावतें सागर में गागर भरने जैसा कार्य करती हैं. वाक्य को सुन्दर और महत्वपूर्ण बना देती हैं बशर्ते कि सही कहावत सही समय पर इस्तेमाल की जाये. आज मैं अपने ज्ञान भंडार को टटोलते हुए एक पुरानी कहावत " मच क्राई एंड लिटिल वुल " यानि ऊँची दुकान , फीके पकवान " पर जा अटका. वैसे इस कहावत का इस्तेमाल तब किया जाता है जब जहां से जैसी अपेक्षा होती है वहां से उन अपेक्षाओं की पूर्ति में कमी रह जाती है. किन्तु सच मानिये कि सरकारी दुकानदारी के सम्बन्ध में यह कहावत फेल है. बाज़ार में तेजी-मंदी का दौर चलता होगा पर सरकारी दुकानदारी हमेशा गर्म रहती है. खाने-खिलाने की परंपरा है. जितनी ऊँची दुकान उतने ही मीठे पकवान खिलाने पड़ते है. कुछ को खाने में तो कुछ लोगों को खिलाने में मज़ा आता है. खिलाने वाले अपने सामर्थ्य के अनुसार " खजानी " ( मानव मंदिर वाला नमकीन नहीं ) लेकर चलते है. कई बार तो सरकारी दुकान अचानक चलित हो जाती है और दुकानदार खुद चलकर खाने आ जाता है. यह खिलाने वाले की कूबत पर निर्भर करता है. खाने वालों का छोटा-बड़ा मुंह हमेशा खुला रहता है. व्यवस्था है भाई, क्या करोगे. पेट भरे न भरे पर खाना और खिलाना ज़रूरी है. पेटू व्यवस्था की यही रीति है. बात जब खाने-खिलाने की निकल ही गई है तो इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि कुछ लोगों की सिर्फ विशेष चीज़ ही खिलाने की आदत होती है. कोई अपनी जेब में काजू-किसमिस भरकर निकालता है तो कोई चाकलेट -पीपरमेंट. जितने लोग मिले, सबको बांटना इनकी फितरत में होता है. आपको भले ही कस के भूख लगी हो, सामने वाला जबरदस्ती सौंफ खिलाने का प्रयास करेगा. किसी-किसी को लौंग खाने की आदत होती है. अपनी इस आदत को लोगों पर थोपने से भी ऐसे लोग पहरेज़ नहीं करते. भले ही आपको पसंद न हो पर लौंग पेश करते हुए सामने वाला ऐसा स्नेह उडेलेगा कि खाओ न खाओ, बाद की बात है पर स्वीकारना औपचारिक मज़बूरी हो जाती है. इस तरह का स्नेह उड़ेलने वाले यह भी नहीं देखते कि वो कहाँ, किसलिए पहुंचे है. अभी दो दिन पहले एक सज्जन स्वर्ग सिधार गए. अंतिम यात्रा निकली. जहां तक पहुँचाना था, पहुंची. दाह संस्कार कि तैयारी चल रही थी. एक सज्जन ने आकर मुझसे हाथ मिलाया. प्यार भरी मुस्कराहट छोड़ते हुए वह अगले से मिलाने चला पर मेरे हाथ में सुनहरा रैपर वाला पीपरमेंट छोड़ गया. मै सोंचने लगा, यह भी व्यवस्था का एक हिस्सा है भाई, चलने दो. 

Saturday, 4 February 2012

टूट गया ' मधुमक्खियों ' का घरौंदा ' ततैयों ' की ईमारतें खड़ी

आसमान में बदल छाये थे,  इसलिए आज धूप भी देर से निकली. हवाओं का प्रवाह गुदगुदी ठंडकता को आमंत्रित कर रहा था. मोहरा रोड में जहाँ पुलिया बनाई जा रही वहां लोगों की भीड़ देख सहसा मै भी रुक गया. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे कोई राहगीर फिर किसी वाहन चालक की बेपरवाही का शिकार हो गया होगा. दूरियां समाप्त होते ही कानों में " शहेद लो शहेद " की आवाज़ सुनाई देने लगी. लोग जिसे घेरकर खड़े थे, वो ही बीच में बैठा चिल्लाते भी जा रहा था. उसके पास बिसलरी की खाली बोतलों का ज़खीरा था.  जर्मन के एक बड़े डिब्बे में मधुमक्खियों का छाता सहित ' मधुरस ' भरा था. उसी ' मधुरस ' में दर्जनों मक्खियाँ जहाँ मरी पड़ी थी वहीँ सजीव मक्खियाँ आस-पास मंडराते भी जा रही थी. ढाई सौ रुपये लीटर में वह लोगों को ' मधुरस ' दिए जा रहा था. साथ में मरी मक्खियाँ लोग मुफ्त में पा रहे थे. भीड़ में से सवालिया आवाज़ आई - " कहाँ के रहने वाले हो ? " ज़वाब आया- "झारखण्ड के है."  फिर सवाल हुआ- " मधुरस से मक्खियाँ तो अलग कर लेते.? " वो कहने लगा- "बाबूजी,  यही तो मधुरस के प्योर होने का सबसे बड़ा प्रमाण है ." जितने लोग वहा से गुजर रहे थे, सब उस जगह पर रुकते जा रहे थे. एक सज्जन वहां रुकने व माज़रा समझने के बाद कहने लगा-" तुमने मधुमक्खियों का घरौंदा तोड़ दिया? " सब ठहाके मारने लगे.   मधुरस बेचने वाला तो चुप रहा पर भीड़ में से दूसरा कहने लगा- " हाँ भाई, ठीक ही कह रहे हो, " मधुमक्खियों " का घरौंदा टूट रहा है और शहर के बीच " ततैयों " की ईमारतें खड़ी हैं."  बेचने वाला सब से कहता जा रहा था कि चख कर देखिये, प्योर मधुरस है. इस बीच लेने वालों ने लिया और चखने वालों ने चखा. धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी. जब ' मधुरस ' बेचने वाला अपना सामान समेटने लगा तो उसकी एक थैली से गुड की छोटी-बड़ी डालियाँ नीचे गिरकर ' मधुरस '  की वास्तविकता बयां कर गई.

Sunday, 22 January 2012

लाल सांड निकला दस हजारी..




बिना दुन्दुभी बजे आज सुबह दो सांड में जंग छिड़ गई. इस बीच कोई गाय दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रही थी किन्तु ये सांड  पता नहीं किस बात से  एक दूसरे पर गुस्सा करते हुए अचानक भिड गए थे. ज़गह ऐसी थी कि दोनों लड़ाई छोड़ भाग नहीं सकते थे इसलिये घेरे में ही रहकर लड़ना दोनों की मज़बूरी हो गई थी. सैकड़ों की संख्या में सोमवार २३ जनवरी की सुबह नौ बजे से नगर  के जय स्तम्भ चौक में करीब दो घंटे तक लोगों ने इन सांडों  की लड़ाई का भरपूर आनन्द उठाया. इस लड़ाई में एक अवसर ऐसा भी आया कि इनमें से लाल वाला सांड उछलकर पार्किंग के घेरे का दायरा लांघने का प्रयास भी किया किन्तु तमाशबीनों ने सांड के प्रयास को असफल बना दिया. इसी लाल सांड पर एक सेठ मित्र ने अगले के साथ दस हज़ार रुपये का दांव लगा दिया था. लड़ते-लड़ते ज़ब लाल सांड एक बार भागने लगा था तो दांव लगाने वाले की घिग्घी बंद होने लगी थी.  भोलेनाथ ने अंतत:  उसका साथ दिया,  कुछ देर की लड़ाई और चली..फिर अब की बार लाल वाला नहीं बल्कि चितकबरा सांड उलटे पांव भाग खड़ा हुआ. इस तरह से लाल वाला सांड दस हजारी निकला. दांव लगाने वाला तो दस हज़ार पा गया पर सांडों की लड़ाई थम नहीं पाई. जय स्तम्भ चौक से पुनः चितकबरे के पीछे भागते हुए लाल सांड ने उसे मानव मंदिर के पास रोक लिया.इसी दौरान भीड़ से " शांत हो जाओ भोलेनाथ.....शांत " की आवाज़ भी आने लगी थी.   कुछ  देर की लड़ाई बाद ये सांड  पीछे ' बग्गा ' गांजा गली होते हुए पुराना अस्पताल रोड पहुँच गए. सांडों के पीछे जय स्तम्भ की पूरी भीड़ चल रही थी. कोई, " खेलने दो- खेलने दो" चिल्ला रहा था, कोई डंडा लहरा रहा था तो कोई इन पर गिलास-गिलास पानी फेंक रहा था. तकरीबन बीस से पच्चीस मिनट तक इनकी जंग और चली. लोगों ने भरपूर मज़ा लिया. सांडो की लड़ाई समाप्त होने के बाद धीरे से भीड़ भी छंट गई.

Saturday, 7 January 2012

यहाँ भी " चूहे-बिल्ली " का खेल ...?

शनिवार 7 जनवरी को मुझे भी सिटी हास्पिटल जाना पढ़ गया. शाम का समय था. शाम इसलिए कि डाक्टर साहब राजनंदगांव के मरीजों को शाम-रात को ही देखते है. वहां  काउंटर में दो से तीन कर्मी बैठे थे. गाने वाला एक चेनल टीवी पर चल रहा था. डाक्टर के आगमन के इंतजार में और भी ढेरों लोग बैठे थे. एक मोटा आदमी वहां रखी क्वाइन बॉक्स वाली मशीन में सिक्के डाल-डाल कर अपना वज़न आजमा रहा था. एक ही व्यक्ति का तकरीबन कुछ समयांतराल में अलग-अलग वज़न का टोकन निकलने से वह परेशान सा हो गया था. पहली बार 95  किलो...दूसरी बार के प्रयास में तीन किलो वज़न घट गया. तीसरी बार तो हद ही हो गई. एक किलो और घट गया. इस तरह  से तीन सिक्के हज़म करने के बाद उस मशीन ने घटतेक्रम में वज़न बताया. जब उस मोटे आदमी ने वहां बैठे और लोगों को मशीन से क्रमवार निकले वज़न के आंकड़ों का परिणाम बताया तो सब खिलखिलाकर हंस पड़े. वज़न घटाने हजारों रुपये माह में फूंक देने वालों की खुशफहमी के लिए शायद ऐसी मशीन कारगर हो सकती है. इस ठहाकेदार वाकिये के बाद सब डाक्टर के आने की राह  देख ही रहे थे कि वेटिंग हाल में कहीं से फुदकता हुआ एक छोटा चूहा आया. बिल्ली की " गिद्ध दृष्टि  " शायद उस पर पहले से ही पड़ गई थी.बिल्ली ने  एक झपट्टा मारकर उसे अपने पंजे में जकड लिया. कुछ देर पंजे में ही दबोचे  रखने के बाद छोटे चूहे को सीधे अपने जबड़े में दबाकर बिल्ली उसे अधमरा करने लगी. यह सब नज़ारा वहां जितने लोग बैठे थे, सब ने देखा. काउंटर में बैठी एक महिला अटेंडेंट को उस छोटे चूहे पर तरस आने लगी.भावावेश में बिल्ली के मुंह से चूहा छुड़वाने का प्रयास करने लगी. एक बार उसे इस प्रयास में सफलता भी मिलती नज़र आई. बिल्ली के मुंह से छूटकर छोटा चूहा फिर वहां  फुदकने लगा था पर उसका दुर्भाग्य कि वह दोबारा बिल्ली के पंजे में कैद होकर रह गया . सब की  नज़रों के सामने से बिल्ली अपना शिकार लेकर बाहर एकांतवास में चली गई. डाक्टर के आने तक इसकी चर्चा चलते रही. कोई चूहे को बेचारा कहकर शोक मना रहा था तो कोई इकोलाजिकल सिस्टम बता रहा था.