Wednesday, 7 December 2011

बाल मेला का उत्साह ......

मेरा बच्चा आज सुबह से इस बात की जिद्द करने लगा था कि पापा आज काम पर मत जाओ, जाओगे तो दो बजे तक आ जाना, नहीं तो मै मारूंगा . सुन कर पहले तो मुझे अटपटा लगा कि ये ऐसा क्यों बोल रहा है. बाद में पता लगा कि उनके स्कूल वाले ईन्द्रपुरी (नगर में स्थित एक आयोजन स्थल ) में बालमेला लगा रहे है. मै अपने काम से आज इसी वजह से जल्दी आ गया. करीब ढाई बजे घर पहुंचा तो वह अपनी मम्मी के साथ बाल मेला जा चुका था. उस बाल मेला का मेरा उत्साह घर आते ही काफूर हो गया था. बाद में मै भी वहां पहुंचा. मेले में स्टाल लगे हुए थे. मुझे लगी थी भूख, चाट सेंटर में कुछ खाने की गरज से पहुंचा . भेल मांगने पर पता चला कि वहां रूपया-पैसा नहीं बल्कि पैसे में ख़रीदा जाने वाला संस्था का कूपन चल रहा था. नगद रख कर भी मुझे स्टाल से भूखा लौटना पड़ गया. बच्चे से मुलाकात हुई तो वह उसी कागज के कूपन से झूला झूल रहा था. बाजू का स्टाल वाला चिल्ला रहा था- "बुड्ढी का बाल ले लो" एक घुमाने वाली मशीन में वह थोड़ी शक्कर डालता था और जब शक्कर के रेशे निकलते थे तो उसे एक कमचिल में इकट्ठा करते जाता था . स्कूल के छोटे बच्चे उसे बड़े चाव से खाते जा रहे थे. बच्चों के मनोरंजनार्थ वहां कई खेल चल रहे थे. अंत में मै पांच रुपये के कूपन में एक पानी पाउच पीकर बाल मेले के अपने उत्साह का परिचय दिया और परिवार सहित घर का रुख किया.

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