Sunday, 4 December 2011

मुंह की हवा और गानों की सुरीली धुन.........

" जादूगर सईयाँ , छोड़ो मेरी बहियाँ ...., हो गई आधी रात........,  झूठ बोले ...,कौंवा काटे..., काले कौंवे से डरियो......"   " हाय..हाय ये मजबूरी , ये मौसम और ये दूरी ..." जैसे गानों की धुन सुनकर सहसा मेरे भी कदम रुक गए. वहां और लोग भी जुटे हुए थे. बेचने वाला बांसुरीनुमा तूती तुरंत बना भी रहा था. उनका हाँथ तेजी से चलने लगा था. मुंह में तूती लगाकर फूंक की हवा से वह कई तरह के गानों की सुरीली धुन निकल रहा था. वह कोई और नहीं बल्कि भिलाई निवासी जोसब है.  बांस प्रजाति की 'भरुआ' काडी से वह फटाफट तूती बनाते जा रहा था. एक तूती वह बीस रुपये में बेचता है. पुराना दुर्गा टाकिज के पास व मोहरा से उन्हें ढेरों भरुआ काडी मिल जाती है. वह तूती बनाते भी जा रहा था और बीच-बीच में गाने की धुन निकालते हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी करते जा रहा था.   मैने पूछा ...' मुझसे भी ऐसी ही धुन बजेगी क्या..,  क्या , इससे हम भी गानों की धुन बजाना सीख सकते है..?' उनका जवाब मजेदार था. कहने लगे - बिलकुल नहीं . इससे तो बिल्कुल नहीं सीख सकते. क्योंकि ये कुछ देर बाद वैसे ही ख़राब हो जायेगा.  हम तो बच्चों को भुरियाने के लिए ये एक तरह से खिलौना मात्र बनाते है. हाँ कोई यदि बांसुरी से सीखनें की का प्रयास करे तो सुर ज़रूर पकड़ सकता है.    

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