" कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! "

रात की अंधियारी छाई थी! घडी का छोटा कांटा ग्यारह पे तो बड़ा कांटा पांच पे था!  सेकण्ड का कांटा बारिश की फुहारों के चलते मारे ख़ुशी के दो गज उछाल-उछलकर चल रहा था! बाइक से मैं घर लौट रहा था ! गांधी चौक पंहुचा ही था कि एक कुत्ता भौकते हुए ऐसे दौड़ते हुए आया जैसे अब-तब काट ही खायेगा ! उसके पीछे चार-पांच और कुत्तों की तत्काल आमद हो गई! फिल्मों के महानायक धर्मेन्द्र की भांति " कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! " टाइप का कोई डॉयलॉग भी नहीं  मार सकता था! अरे उस समय तो अपनी जान बचने की पड़ी थी! बदहवासी की  हालत में मेरे मुंह से एक बेहद भद्दी गाली [ यहाँ लिख नहीं सकता ] जोरदार आवाज में निकली ! मैंने बाइक वहीँ रोक दी ! कहां अच्छा-खासा सावन की फुहारों का मजा लेते लौट रहा था, कुत्तो ने मुझसे गालियों  की झड़ी करवा दी! मेरे रुकते ही सारे कुत्ते अपनी जगह पर रूककर एकसाथ अपनी राग अलापने लगे थे! अंत में फिर एकबार एक गाली चटकाने के साथ ही बारी-बारी सभी कुत्ते उल्टेपांव भागने लगे! जब सभी भाग गए, तब मैंने राहत की सांस ली! मेरा रास्ता साफ हुआ और मैं आगे बढ़ गया! अब तक का अनुभव यही बताता है कि जब कभी रास्ते में कुत्ते दौड़ाये तो चिल्लाकर आवाज करते हुए रुक जाना चाहिए। भागने की कोशिश की तो समझो कुत्ते अपनी मंशा में कामयाब हो जायेंगे …!!! "   

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