Thursday, 13 March 2014

" अब की होली टन... टन... टन...!!! "

मुंह लाल... आंखें गुलाबी... और हांथ में पिचकारी लिए जो बच्चे अभी धमाचौकड़ी मचा रहे हैं, ये वो ही बच्चे हैं जो एक दिन पूर्व संध्या ठीक होलिका दहन के वक्त " होली के होकड़ी " चिल्ला रहे थे!मै जब घर से निकला तो मेरे स्वयं के आभामण्डल में कुदरती रंगों की बहार थी. मेरे मन में होली के कृत्रिम रंगों का इंद्रधनुष समाया हुआ था. मै चौराहे पर पहुँच भी नहीं पाया था कि दो हाथ पीछे से आकर मेरे चेहरे को मलने लगे थे. चंद समय में ही मुझे एहसास हो गया कि किसी ने मेरे चेहरे को मोबिल पेंट से पोत दिया है. कोई गोबर खेल रहा था तो किसी को नाली का कीचड़युक्त पानी प्यारा लग रहा था. सभी अपने में मस्त नज़र आ रहे थे. कभी सुनते थे कि भगवान श्री कृष्ण की बंशी होली में बजती थी तो उसकी धुन में राधा बावली हो जाती थी. सात्विक ठिठोली होती थी. " कृष्ण " होली में " राधा " को रंगते हुए अब भी दिखता है. नाम " बृज की होली " भले ही रख दिया जाता है पर अमीर का अहम् और गरीब की संकीर्णता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है. टूटे दिल जुड़ने की बजाय चकनाचूर हो जाते हैं. " रंग में भंग" पड़ने से सूखे कंठ की प्यास नहीं बुझ पाती. खैर, भरपूर मौज-मस्ती के इस पर्व में मेरे मन का " कबीरा " भी फाग गाने-सुनने उद्यत था. मैंने अपने काले-कलूटे मुंह लिए चौराहे पे नजर दौड़ाई। मैंने देखा कि नंगाड़े की थाप पर लोग थिरक रहे हैं.... फाग गूंज रहा है.... ढोल अंगड़ाई ले-लेकर लोगों को अपनी ओर खींच रहा था. बाजू में कुछ लोग अद्धी... पौव्वा …और ठर्रे के साथ मस्त थे तो कुछ लोग जे.....के.... क्यू ...यानी गुलाम, बादशाह और बेगम पर खुलकर दांव लगा रहे थे. होली के मस्तीभरे गीत " रंग बरसे, भीगे चुनर वाली.... होली आई रे कन्हाई,होली आई रे … आज न छोड़ेंगे हम हमजोली, खेलेंगे हम होली... होली खेले रघुवीरा, अवध में होली खेले रघुवीरा... के बोल के साथ ही बच्चे, बूढ़े व जवान मुन्नी बदनाम और शीला की जवानी पर ढिंक चिका … ढिंक चिका … ढिंक चिका करने लगे थे. इन दिनों " तू ने मारी इंट्री यार दिल में बज़ी घंटी यार ...!!! " की धूम है. लगता है, अब की होली " टन … टनाटन.... टन " होगी।

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