Wednesday, 3 September 2014

" हिचकोले तो खाने पड़ेंगे प्रभु...!!! "

महाप्रभु श्री गणेश जी से मूषकराज कहने लगा- " सावन तो गया, भादो में बरसाती घटा का साया दिख रहा है ! बारिश का दौर जारी है ! छत्तीसगढ वैसे भी जंगलों से परिपूर्ण है, एक बार घटाटोप बादल इसके उपर छा जाये तो इसकी हरियाली देखते ही बनती है ! हरी-भरी धरती का सुख प्राप्त हो रहा है, इस अदभुत झांकी से अच्छी झांकी और क्या होगी प्रभु ! बहुत मजा आ रहा है! आपकी कृपा से रोज सेव, केला, मौसंबी, संतरे के साथ ही भुजिया, नमकीन का स्वाद लेने मिल रहा है! " प्रभुश्री मुस्कुराते हुए बोले- " ये सब कहने-बोलने की जरुरत ही क्या है ? " मूषकराज जी कहने लगे- " प्रभु, जब आप आराम की मुद्रा में थे तब मै उस ओर निकल गया जो विसर्जन मार्ग है ! मैने देखा, 1 किमी में 500 से कहीं अधिक छोटे-बडे गड्ढे हैं ! उन गड्ढों में पानी भी भरा है जिससे खतरा और बढ़ गया है ! क्या बताऊं प्रभु, मुझे खुद डंका-चम्पा करते लौटना पड़ा ! " मूषकराज की बातें सुन प्रभु ने फिर एक मधुर मुस्कान बिखेरी ! मूषकराज कहने लगा- " आप तो बस मोदक सेवन कर मंद-मंद मुस्कुराते रहिए, पर इतना जान लीजिये कि हिचकोले तो आपको भी खाने पडेंगे ! " मूषकराज की बात समाप्त होते-होते आरती की बेला आ गई, भक्तगण जुट गये और " जय गणेश...जय गणेश...जय गणेश देवा! " के बोल समवेत स्वर में गूंजने लगे...!!! "
" जय श्री गणेश...!! "

3 comments:

  1. कम शब्दों में बहुत गहरा विश्लेषण । बहुत बढिया राजेश भईया

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  2. शुक्रिया अजय भाई !

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  3. शुक्रिया अजय भाई !

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