" हां भई... चल रही लहर है....!!! "

लोग कहते हैं, देश मे लहर चल रही है.... अरे तो किसे इंकार है भाई... लहर तो चल ही रही है, पेट्रोल-डीज़ल के दाम लहरा-लहरा के बेतहाशा बढ़ने की... कमरतोड़ महंगाई की... खाली हाथों को काम न मिलने की... पीने के साफ पानी की... रसोई गैस के दाम बढ़ने और किल्लत की... घपलों-घोटालों और भ्रष्टाचार की... या फ़िर रोज बह रहे बेगुनाहों के खून की नदियों की ही क्यों न हो आखिर चल तो लहर ही रही है! कहते हैं, लहरें आवारा होती हैं, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, न्याय, विकास, जोड़-तोड़, देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक तिकड़मबाजी, जहर उगलती जुबां की आवारा लहरें उफान पर हैं! जिन खेतों मे हरी-भरी फसलें लहलहाया करती थीं... उन खेतों मे दरारें दिखने लगी हैं! खेत की दरारें पानी मांग रही हैं पर उसे बून्द भी नसीब नहीं हो पा रह है ! न सरसों का पीलापन दिखता न अलसी की महक आ रही है! खेत उजाड़ और अनाज के गोदाम खाली हो रहे हैं! पालतु पशुओं को हरा चारा क्या सूखा तिनका भी नहीं मिल रह है! बाजार मे बे-मौसम कच्चे-पके आम जरूर बिक रहे हैं पर बेचने वालों को इस बात का तनिक भी एहसास नहीं कि आखिर आम के बौर मुरझाने क्यों लगे हैं...?  इन दिनों एक अजीब तरह की गहमागहमी, हलचल, जी हुजूरी और वोटरों की खुशामद की लहर चल रही है! झूठे वायदों... बड़बोले वचनों और ओछे दावों की लहर के बीच छुप्पन-छुपाई और चुम्मा-चामी से भी कइयों को परहेज़ नहीं हैं! पता नहीं क्यों, सियासी चेहरों की हर लकीरें उनके कमीने इरादों की कहानी बयां करने लगी हैं! जय हो...!!!  

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