Tuesday, 17 June 2014

" आये बदरा कारे-कारे...!!! "


चिलचिलाती धूप थी, लू का कहर था, तेज अँधड के बाद जब मिट्टी की सौंधी खुशबू आने लगी तो पतछड में खोया बरगद प्रफुल्लित होकर आहें भरने लगा । लू के थपेडे खाकर अधमरी हो चुकी गौरइया अब सांस लेने लगी है। अब वह धूल स्नान करना छोड़ " छपक-छइया " करने में जुट गईं हैं । चीं...चीं...चीं... की आवाज फिर गूंज उठी और उसकी आँखों में हरियाली सी छा गई । अरे, बादल जो सज-संवरकर आया है और मानो कह रहा हो-" बडे अच्छे लगते हैं ... ये धरती...ये नदिया...और तुमsssss...!!! " संस्कारधानी नगरी राजनांदगाँव के मोहारा जल शोधन व संवर्धन गृह से लगाकर बहती अगाध शीतलता बिखेरने वाली शिवनाथ नदी आसमान मे छाये बादल के ठाठ-बाट को देख ऐसे लजाने लगी थी जैसे कोई नवयौवना अपने प्रियतम के सामने घूंघट सरकाते शरमाती है। लरजकर ही सही पर जैसे कह रही हो-"आये बदरा...कारे-कारे...!!!" दुल्हा सरीखे बन-ठन के पहुंचे बादल के आगे-आगे नाचती-गाती सी बयार ऐसे चलती रही जैसे किसी मधुर धुन में संगत कर रही हो। झुके पेड़-पौधे अब अपनी गर्दन उचका-उचकाकर धूल से कहने लगी थीं कि " चल भाग री करमजली, अब तेरा कौन है यहाँ...!!! " अलसाये पीपल ने भी दो कदम आगे बढ़ कर कारे बदरा की आगुवानी की। मिलन की बेला में लताओं  की जीभ भी लपलपाने लगी थी। बारिश की छोटी-बडी बूंदों ने धरती का श्रृंगार जो शुरु कर दिया है । " जय हो...!!! "

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