Tuesday, 10 April 2012

व्यवस्था है भाई, चलने दो........

कहते हैं, कहावतें सागर में गागर भरने जैसा कार्य करती हैं. वाक्य को सुन्दर और महत्वपूर्ण बना देती हैं बशर्ते कि सही कहावत सही समय पर इस्तेमाल की जाये. आज मैं अपने ज्ञान भंडार को टटोलते हुए एक पुरानी कहावत " मच क्राई एंड लिटिल वुल " यानि ऊँची दुकान , फीके पकवान " पर जा अटका. वैसे इस कहावत का इस्तेमाल तब किया जाता है जब जहां से जैसी अपेक्षा होती है वहां से उन अपेक्षाओं की पूर्ति में कमी रह जाती है. किन्तु सच मानिये कि सरकारी दुकानदारी के सम्बन्ध में यह कहावत फेल है. बाज़ार में तेजी-मंदी का दौर चलता होगा पर सरकारी दुकानदारी हमेशा गर्म रहती है. खाने-खिलाने की परंपरा है. जितनी ऊँची दुकान उतने ही मीठे पकवान खिलाने पड़ते है. कुछ को खाने में तो कुछ लोगों को खिलाने में मज़ा आता है. खिलाने वाले अपने सामर्थ्य के अनुसार " खजानी " ( मानव मंदिर वाला नमकीन नहीं ) लेकर चलते है. कई बार तो सरकारी दुकान अचानक चलित हो जाती है और दुकानदार खुद चलकर खाने आ जाता है. यह खिलाने वाले की कूबत पर निर्भर करता है. खाने वालों का छोटा-बड़ा मुंह हमेशा खुला रहता है. व्यवस्था है भाई, क्या करोगे. पेट भरे न भरे पर खाना और खिलाना ज़रूरी है. पेटू व्यवस्था की यही रीति है. बात जब खाने-खिलाने की निकल ही गई है तो इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि कुछ लोगों की सिर्फ विशेष चीज़ ही खिलाने की आदत होती है. कोई अपनी जेब में काजू-किसमिस भरकर निकालता है तो कोई चाकलेट -पीपरमेंट. जितने लोग मिले, सबको बांटना इनकी फितरत में होता है. आपको भले ही कस के भूख लगी हो, सामने वाला जबरदस्ती सौंफ खिलाने का प्रयास करेगा. किसी-किसी को लौंग खाने की आदत होती है. अपनी इस आदत को लोगों पर थोपने से भी ऐसे लोग पहरेज़ नहीं करते. भले ही आपको पसंद न हो पर लौंग पेश करते हुए सामने वाला ऐसा स्नेह उडेलेगा कि खाओ न खाओ, बाद की बात है पर स्वीकारना औपचारिक मज़बूरी हो जाती है. इस तरह का स्नेह उड़ेलने वाले यह भी नहीं देखते कि वो कहाँ, किसलिए पहुंचे है. अभी दो दिन पहले एक सज्जन स्वर्ग सिधार गए. अंतिम यात्रा निकली. जहां तक पहुँचाना था, पहुंची. दाह संस्कार कि तैयारी चल रही थी. एक सज्जन ने आकर मुझसे हाथ मिलाया. प्यार भरी मुस्कराहट छोड़ते हुए वह अगले से मिलाने चला पर मेरे हाथ में सुनहरा रैपर वाला पीपरमेंट छोड़ गया. मै सोंचने लगा, यह भी व्यवस्था का एक हिस्सा है भाई, चलने दो. 

2 comments:

  1. as always... good writing...guruji kya topic pakda hai aapne???badhai apki lekhni ko

    ReplyDelete