Saturday, 4 February 2012

टूट गया ' मधुमक्खियों ' का घरौंदा ' ततैयों ' की ईमारतें खड़ी

आसमान में बदल छाये थे,  इसलिए आज धूप भी देर से निकली. हवाओं का प्रवाह गुदगुदी ठंडकता को आमंत्रित कर रहा था. मोहरा रोड में जहाँ पुलिया बनाई जा रही वहां लोगों की भीड़ देख सहसा मै भी रुक गया. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे कोई राहगीर फिर किसी वाहन चालक की बेपरवाही का शिकार हो गया होगा. दूरियां समाप्त होते ही कानों में " शहेद लो शहेद " की आवाज़ सुनाई देने लगी. लोग जिसे घेरकर खड़े थे, वो ही बीच में बैठा चिल्लाते भी जा रहा था. उसके पास बिसलरी की खाली बोतलों का ज़खीरा था.  जर्मन के एक बड़े डिब्बे में मधुमक्खियों का छाता सहित ' मधुरस ' भरा था. उसी ' मधुरस ' में दर्जनों मक्खियाँ जहाँ मरी पड़ी थी वहीँ सजीव मक्खियाँ आस-पास मंडराते भी जा रही थी. ढाई सौ रुपये लीटर में वह लोगों को ' मधुरस ' दिए जा रहा था. साथ में मरी मक्खियाँ लोग मुफ्त में पा रहे थे. भीड़ में से सवालिया आवाज़ आई - " कहाँ के रहने वाले हो ? " ज़वाब आया- "झारखण्ड के है."  फिर सवाल हुआ- " मधुरस से मक्खियाँ तो अलग कर लेते.? " वो कहने लगा- "बाबूजी,  यही तो मधुरस के प्योर होने का सबसे बड़ा प्रमाण है ." जितने लोग वहा से गुजर रहे थे, सब उस जगह पर रुकते जा रहे थे. एक सज्जन वहां रुकने व माज़रा समझने के बाद कहने लगा-" तुमने मधुमक्खियों का घरौंदा तोड़ दिया? " सब ठहाके मारने लगे.   मधुरस बेचने वाला तो चुप रहा पर भीड़ में से दूसरा कहने लगा- " हाँ भाई, ठीक ही कह रहे हो, " मधुमक्खियों " का घरौंदा टूट रहा है और शहर के बीच " ततैयों " की ईमारतें खड़ी हैं."  बेचने वाला सब से कहता जा रहा था कि चख कर देखिये, प्योर मधुरस है. इस बीच लेने वालों ने लिया और चखने वालों ने चखा. धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी. जब ' मधुरस ' बेचने वाला अपना सामान समेटने लगा तो उसकी एक थैली से गुड की छोटी-बड़ी डालियाँ नीचे गिरकर ' मधुरस '  की वास्तविकता बयां कर गई.

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