Wednesday, 12 June 2013

"उई मां...उई मां ...ये क्या हो गया...!!!?


" बडे अच्छे लगते हैं.... ये धरती ....ये नदिया....और त् उ उ उ उ उ उ म !!!"(मेरे मोबाईल का रिंगटोन) जैसे ही बजने लगा, कुछ देर इस कर्णप्रिय गाने को सुनने के बाद- " हां, बोल इकबाल ? (यद्यपि मैने डिस्प्ले देख लिया था तथापि बिना हाय...हैलो की औपचारिकता के सीधी बात की) प्रतिउत्तर मिला- " गंगा ( होटल गंगा )में आइए, चाय पीते हैं। " मैं जब पहुंचा तो टेबिल पर चाय आ चुकी थी। हम चुस्कियां लेने लगे। अचानक " उई मां....उई मां " की आवाज के साथ एक युवती कुर्सी से लगभग उछल पडी थी। उसके चेहरे का हाव-भाव बता रहा था कि उसके शरीर में भयवश सिहरन सी दौड गई थी। उसे सामान्य होने में तकरीबन पंद्रह मिनट लग गए। उसकी इस बदहवासी का कारण जब सामने आया तो रेस्तरां में ठहाके गूंजने लगे। आखिर ऐसा क्या हुआ होगा ? समझ सकते हैं । यह जरुर बताएं कि आप मे से ऐसे कौन-कौन हैं जिन्हें " काकरोच " से डर लगता है...!!!!????

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