Wednesday, 12 June 2013

" चिकनी चुपडी चाची !


शाम जा रही थी और बहार आ रही थी। हम दोस्तों के साथ " फुर्सत के पल " ( मेरे सहनाम के होटल का नाम है ) से चाय पी कर लौट रहे थे। अचानक मेरी नजर एक पडे हुए सिक्के पर पडी। मानवीय स्भावानुकुल जब उसे उठाया तो सिक्का नहीं " टिल्लस " निकला। मैं शर्मिन्दा और मेरे साथ वालों की हंसी का ठिकाना नहीं था। मै दोस्तों के उपहास का दंश झेल ही रहा था कि ऐसा लगा जैसे मुझसे कोई कुछ कहना चाह रहा है। नजरें दौडाई तो मेरे साथ वाले आगे निकल चुके थे और मैं अनजानी आवाज सुन वहीं ठिठक गया। दरअसल मुझसे यह कहा जा रहा था - " क्या देख रहा है रे ? नगरों में लोग जो मेरा रुप देखते हैं, वह अत्यंत आकर्षक और साफ सुथरा है। मेरे शरीर पर कहीं मिट्टी दिखाई नहीं देगी। चिकनी-चुपडी चाची के समान मै भी सुन्दर और आकर्षक लगती हूं। मुझ पर चलने में आनंद आता है। कारें, बसें और अन्य दूसरे वाहन मुझ पर तेज गति से दौडते रहते हैं। मै भले ही निर्जीव समझी जाती हूं, पर मुझमें चेतना है। मै तो गांव को गांव से, नगर से जोडने का काम करती हूं।मेरा काम एक देश को दूसरे देश से मिलाना है। परस्पर जुडाव से मै भाईचारे का भाव पैदा करती हूं। स्वयं दूसरों के पैरों के नीचे पड कर सब का हित करने में लगी रहती हूं। काश ! लोग मेरे महत्व को समझ कर मेरा ध्यान रखते ? " मेरे पास कहने को कोई शब्द नहीं थे। आप लोगों के पास हो तो जरुर कहिए ।



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