Tuesday, 17 March 2015

" कैसी शर्म औार कैसी हया...!!! "

एक बच्चा स्कूल ड्रेस पहने सड़क किनारे लोटा लिए बैठा था। कभी गाना गाता तो कभी जोर लगाता रहा। ऐसे मौके पर जो ध्वनि (टाॅस... ट्वीं... फुस्स... फास...) निकलती है, वो सब निकलते जा रही थी। अचानक वहां झाडू-फाडू वाले आ धमके और उस बच्चे को यह कह कर धमकाने लगे कि " पूरा देश यहां सफाई अभियान में जुटा है और तुम खुले में 'टाॅय...ट्वीं' कर रहो हो, तुम्हें शर्म नहीं आती।"  हो-हल्ला सुनकर जिज्ञासावश गांव का एक बुजुर्ग वहां पहुंचा। बच्चा सकपकाया हुआ वहां बैठा ही था। झाडू-फाडू वाले उस बच्चे को ऐसा धमका रहे थे जैसे उसेने दुनिया का सबसे बड़ा पाप कर दिया हो। बुजुर्ग को माजरा समझते देर न लगी। धमकी-चमकी जारी थी। बुजुर्ग से आखिर रहा नहीं गया। उसने कहा- " अरे पहाड़ पोतने वालों, अब चुप भी करो। शर्म इसे नहीं तुम्हें और दिल्ली वालों को आनी चाहिए। देश के दो लाख सरकारी स्कूलों में अब भी टाॅयलेट नहीं बन पाये हैं, रही बात सफाई की तो सफाई उसी जगह की होती है जो गंदी हो। जब तक कोई जगह  गन्दी नहीं होगी तो सफाई कहां और कैसे करोगे...!!! "  इस बीच मौका पा कर बच्चा लोटा छोड़कर भाग गया। बुजुर्ग ने अपने सलूखे की जेब से चोंगी निकाली और जलाकर धुएं उड़ाते हुए आगे का रूख किया। झाडू-फाडू वाले 'खरर्र...खरर्र' करते अपने रास्ते निकल गये। यही दिन-दुनिया है मित्रों, सब कुछ चल रहा है ओर चलता रहेगा। 

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