Wednesday, 29 May 2013

अरे कौन किसे चिढ़ा रहा है भाई?


'अरे जालिमों, क्या मार ही डालोगे ? भरी गर्मी में कोई तो ठंडे पानी से नहलाओ।Ó गोल-गप्पेदार अपनी रक्तिम रूप को लेकर हमेशा इठलाने वाला टमाटर आज दोपहरी में यही कहने लगा था। अपने ही पसीने की घूंट से अपना कंठ गीला करने मजबूर लौकी 'रामदेवÓ की कृपा से अपने बढ़े दाम पर गर्व करने से नहीं चूक रही थी। अपने गोरे-गोरे गाल की दुहाई देती सफेद बरबट्टी काली बरबट्टी से कह रही थी-'अरी कलमुंही, पहले अपनी शकल तो आइने में देख ले फिर मुझसे मुंह लड़ाना।Ó भिंडी जहां अपनी हरीतिमा पर इतराने लगी थी तो अदरक अपनी मूछों पर ताव देने से नहीं चूक रहा था। पत्तियों की जगह अब सूखी फलदार धनिया गुर्रा रही थी। एक कोने में पस्त होकर परवल आराम की मुद्रा में जरूर दिख रहा था पर जैसे ही वहां से एक गाय गुजरने लगी, कई दिनों से बिक नहीं पाने से खफा परवल लपककर उसके मुंह में समाते हुए बेचने वाले को चिढ़ाने लगा था। अब कमरतोड़ मंहगाई के बीच कौन किसको चिढ़ा रहा है, यह समझने की बात है मित्रों।

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