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" वो अनसुलझा सवाल ! "

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तीर्थयात्रा से अभी-अभी लौटकर आये एक शख्स से आज अचानक मुलाकात हो गई। चाय की चुस्कियों के साथ उन्होंने चर्चा शुरु की। उनकी बातें  सुनकर लगने लगा कि धर्म-कर्म के प्रति शायद उसे वितृष्णा सी हो गई है ! वो कहता जा रहा था, मै सुनता जा रहा था। कहने लगा- " इन दिनों हिन्दू और हिन्दुत्व की चिन्ता खासकर बाबाओं को 'सरकार' से भी ज्यादा होने लगी है। तमाम बाबाओं को प्रणाम करने के साथ ही वह बताते गया कि इसी चिन्ता में बाबाओं की जमात जुटी थी। सिहासन वाले बाबा, 'भगवान' और 'अवतारी पुरुष' का अंतर समझा रहे थे, साथ ही भक्तों द्वारा की जाने वाली पूजा विशेष पर भी वे आपत्ति जता रहे थे। इंतने में 'हवाई जहाज' वाले बाबा भड़क गये, कहने लगे- " हिन्दूधर्म को बर्बाद न करो ! " 'बटलोही' वाले बाबा भी कहां चुप रहने वाले थे, वो कहने लगे- " चरमपंथ को बढावा देना बंद करो। " किसिम-किसिम के बाबा वहां जुटे थे। 'गोली' ( गांजा गली, मानव मंदिर के पीछे ) वाले बाबा अपनी बडी-बडी आखें दिखाते हुए कहने लगे-" किसी के निजी अहंकार के लिए अन्य गेरुआधारियों का इस्त...

" कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! "

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रात की अंधियारी छाई थी! घडी का छोटा कांटा ग्यारह पे तो बड़ा कांटा पांच पे था!  सेकण्ड का कांटा बारिश की फुहारों के चलते मारे ख़ुशी के दो गज उछाल-उछलकर चल रहा था! बाइक से मैं घर लौट रहा था ! गांधी चौक पंहुचा ही था कि एक कुत्ता भौकते हुए ऐसे दौड़ते हुए आया जैसे अब-तब काट ही खायेगा ! उसके पीछे चार-पांच और कुत्तों की तत्काल आमद हो गई! फिल्मों के महानायक धर्मेन्द्र की भांति " कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगा …!!! " टाइप का कोई डॉयलॉग भी नहीं  मार सकता था! अरे उस समय तो अपनी जान बचने की पड़ी थी! बदहवासी की  हालत में मेरे मुंह से एक बेहद भद्दी गाली [ यहाँ लिख नहीं सकता ] जोरदार आवाज में निकली ! मैंने बाइक वहीँ रोक दी ! कहां अच्छा-खासा सावन की फुहारों का मजा लेते लौट रहा था, कुत्तो ने मुझसे गालियों  की झड़ी करवा दी! मेरे रुकते ही सारे कुत्ते अपनी जगह पर रूककर एकसाथ अपनी राग अलापने लगे थे! अंत में फिर एकबार एक गाली चटकाने के साथ ही बारी-बारी सभी कुत्ते उल्टेपांव भागने लगे! जब सभी भाग गए, तब मैंने राहत की सांस ली! मेरा रास्ता साफ हुआ और मैं आगे बढ़ गया! अब तक का अनुभव यही बताता है क...

" आये बदरा कारे-कारे...!!! "

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चिलचिलाती धूप थी, लू का कहर था, तेज अँधड के बाद जब मिट्टी की सौंधी खुशबू आने लगी तो पतछड में खोया बरगद प्रफुल्लित होकर आहें भरने लगा । लू के थपेडे खाकर अधमरी हो चुकी गौरइया अब सांस लेने लगी है। अब वह धूल स्नान करना छोड़ " छपक-छइया " करने में जुट गईं हैं । चीं...चीं...चीं... की आवाज फिर गूंज उठी और उसकी आँखों में हरियाली सी छा गई । अरे, बादल जो सज-संवरकर आया है और मानो कह रहा हो-" बडे अच्छे लगते हैं ... ये धरती...ये नदिया...और तुमsssss...!!! " संस्कारधानी नगरी राजनांदगाँव के मोहारा जल शोधन व संवर्धन गृह से लगाकर बहती अगाध शीतलता बिखेरने वाली शिवनाथ नदी आसमान मे छाये बादल के ठाठ-बाट को देख ऐसे लजाने लगी थी जैसे कोई नवयौवना अपने प्रियतम के सामने घूंघट सरकाते शरमाती है। लरजकर ही सही पर जैसे कह रही हो-"आये बदरा...कारे-कारे...!!!" दुल्हा सरीखे बन-ठन के पहुंचे बादल के आगे-आगे नाचती-गाती सी बयार ऐसे चलती रही जैसे किसी मधुर धुन में संगत कर रही हो। झुके पेड़-पौधे अब अपनी गर्दन उचका-उचकाकर धूल से कहने लगी थीं कि " चल भाग री करमजली, अब तेरा कौन है यहाँ...!!...

" हाय रे गर्मी .... हाय रे बिजली....!!!"

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मेरे हाथ में चाय का प्याला था ! चाय की चुस्कियां लेते अखबार पढने की आदत जो बन गई है! सूरज ने अपनी किरणों का उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया था! परिंदों के चहकने की आवाज़ आने लगी थी! गज़ट पूरा पढ़ भी नहीं पाया था कि बिजली चली गई! बिना पूर्व सूचना के बिजली वालों ने विद्युत प्रवाह बाधित कर आज दिन भर परेशान किया.! सूरज जागकर फिर सोने की तैयारी में थ ा, दरअसल हवाओं के साथ उन्हें पैगाम जो आया था कि अब तुम छुप जाओ... चाँद उतरने वाला है.... सितारे विचरण करने वाले हैं ! परिंदे अपने ठीयों को जाने उद्यत थे! मेरे मोहल्ले की दोपहरी आँखों-आँखों में ही गुज़र गई! दिगर मोहल्ले के लोग नींद भांजकर जाग चुके थे पर बिजली वाले नहीं जग पाये! देरशाम रहत मिली! वज़ह चाहे जो भी हो पर अब सुनने मिल रहा है की बिजली के आम उपभोक्ताओं को बिजली दर में पंद्रह फीसदी करंट लगाने की पूरी तैयारी है! हाय गर्मी .... हाय बिजली....!!!"

" वो शर्मा नहीं उनका नाम 'शर्मा' था...!!! "

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चार शर्मा आपस में बैठ कर सामन्य बातें कर रहे थे! बातों ही बातों में आरक्षण पर चर्चा चल पड़ी! यही चर्चा आगे बढ़ कर अच्छी-खासी बहस में तब्दील हो गई! एक शर्मा कह रहा था- " आरक्षण बेहद गंभीर बीमारी से भी घातक है, समय रहते सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो देश की स्थिति और भी बद से बदतर हो जाएगी! " दूसरा शर्मा भी कहाँ चुप रहने वाला था, 90 प्रतिशत  अंक  लेने   के बाद भी उनका सुपुत्र इंजीनियर नहीं बन पाया था और इसी आरक्षण की बदौलत 45 फीसदी अंक वाला बाज़ी मार गया था! उन्होंने अपनी खीझ निकलते हुए सवाल किया - " आखिर अवसरों की गैर-बराबरी कब तक चलेगी…??? "  तीसरे शर्मा से भी नहीं रहा गया! वो कहने लगा- " आरक्षण तो संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य प्राप्ति का एक साधन मात्र है, जिसका दुष्परिणाम भी सामने हैं! आरक्षण, कुशलता और उत्कृष्टता पर सीधा हमला ही तो है! प्रतिभा पलायन का प्रमुख कारण है! हमारे देश की  प्रतिभाएं विदेशों में खून-पसीना बहाने लगी हैं! देश सेवा की बजाय विदेश सेवा में जुटीं हैं! देश में सिविल सेवाओं की गिरती गुणवत्ता का कारण भी यही आरक्षण है!" इतना सुनते ही च...

" बजारनामा ....!!! "

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 " हाथ ठेले में सब्जियां भरकर " टमाटर, धनिया, मिर्ची, गोभी, भिन्डी, भटा, बरबट्टी वाले...!!! " गलियों में चिल्लाते पहुंचने वाले के पास से ही तकरीबन सप्ताहभर से सब्जियां खरीद कर काम चल रहा था! दरअसल बाजार जाने की मेरी कोताही के चलते ऐसा हो रहा था! घर में आज पूर्वान्ह  जल्दी उठाकर मुझे थैला थमा ही दिया गया! बे-मन गोलबाजार पहुंचा और सब्जियां खरीदने लगा! बाजू में किशोरवय की तीन लड़कियों में से एक ने सब्जी वाले से पूछा- 'टमाटर कैसे दिए...???'  सब्जी वाले ने कहा- ' बीस रुपये किलो…!!!'  ' बाबाजी का ठुल्लू बीस रुपये…! दाम कम हो गया है समझे...!' कहकर खी...खी...खी... करते आगे बढ़ गई! मै सब्जी वाले को और सब्जी वाला मुझे देखते रह गया! ये कैसी संस्कृति और कैसा असर मित्रों....??? " 

" हां भई... चल रही लहर है....!!! "

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लोग कहते हैं, देश मे लहर चल रही है.... अरे तो किसे इंकार है भाई... लहर तो चल ही रही है, पेट्रोल-डीज़ल के दाम लहरा-लहरा के बेतहाशा बढ़ने की... कमरतोड़ महंगाई की... खाली हाथों को काम न मिलने की... पीने के साफ पानी की... रसोई गैस के दाम बढ़ने और किल्लत की... घपलों-घोटालों और भ्रष्टाचार की... या फ़िर रोज बह रहे बेगुनाहों के खून की नदियों की ही क्यों न हो आखिर चल तो लहर ही रही है! कहते हैं, लहरें आवारा होती हैं, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, न्याय, विकास, जोड़-तोड़, देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता, राजनीतिक तिकड़मबाजी, जहर उगलती जुबां की आवारा लहरें उफान पर हैं! जिन खेतों मे हरी-भरी फसलें लहलहाया करती थीं... उन खेतों मे दरारें दिखने लगी हैं! खेत की दरारें पानी मांग रही हैं पर उसे बून्द भी नसीब नहीं हो पा रह है ! न सरसों का पीलापन दिखता न अलसी की महक आ रही है! खेत उजाड़ और अनाज के गोदाम खाली हो रहे हैं! पालतु पशुओं को हरा चारा क्या सूखा तिनका भी नहीं मिल रह है! बाजार मे बे-मौसम कच्चे-पके आम जरूर बिक रहे हैं पर बेचने वालों को इस बात का तनिक भी एहसास नहीं कि आखिर आम के बौर मुरझाने क्यों लगे हैं...?  इन दिनो...