Friday, 22 May 2015

" तोर गइया हरही हे दाऊ....!!! "

" ऐ हे हे हे हे, कजरी कहां जही रे... ओ हो हो हो हो, ऐ टिकला  कहां झपाही रे... ऐ बलही तो आज नंगतेहेच भाव खावत हे...!!! " 
हुरररररर्रट....ठहराले....ठाहराले.... ऐ धंवरी, पिंवरी अउ लाली ल तो आज सोंटरंजन  [ डंडे का प्रहार] परही तइसे लगत हे। आज तो पदोई [परेशान करना ] डरीन ऐ मन ह   खुरमी [तुर्रादार बांस की चिल्फियों से बनी, मयूर पंख लगी बड़ी टोपी] पहिरे बरदिहा अपन लउठी ल लहरावत जात रिहिसे अउ संगे-संग अइसनेच चिल्लावत जात रिहिसे। खइरखाडहान ले बरदी के उसलत देरी नई रिहिसे के भांठा मेरन बस्ती के बड़े दाउ ह सपड़ गे। बरदिहा के जै जोहार के जवाब दे बर छोड़ उल्टा दाऊ भड़क गे। कहिथे- "कस रे बरदिहा... बने चराए कर, कल कजरी ह कोठा में ओइले नई दिखिस... का बात हे रे....???"  सकपकाए असन हो के बरदिहा ह कहिथे-"तोर गइया ह हरही हो गे हे दाऊ... लांहगर बांधे बर परही, आजे बांध दुहुं....!!!"  दाऊ ह कुछु अउ कहितिस तेकर पहिली फेर बरदिहा ह बोले लगिस- "दाऊ जी, ऐ पइंत 9-9 काठा करवाहू भई, महंगई बाढ़ गे हे, अब नई पुराए...!!!"  दाऊ फेर भड़क गे... कहिथे- "चुप रे लपरहा, 7-7 काठा कम हे का रे...??? पहिली ये बता, कजरी ल त हरही हे कथस त बलही ह कइसे नई आये रिहिस रे....???"  मुस-मुस करत, अपन कान ले ठूठी बीड़ी निकालत बरदिहा एक घांव अउ थथमरा गे, चकमक ल ठोंकिस अउ बीड़ी सिपचावत कहिथे- " सोंहड़इन धरे रिहिस दाउ...!!!"  दाऊ कहिथे- "बड़ चतुरा हस निपोर... रहा ले, तोला तो बाद में बतहूं.....!!!"