Friday, 30 May 2014

" वो शर्मा नहीं उनका नाम 'शर्मा' था...!!! "

चार शर्मा आपस में बैठ कर सामन्य बातें कर रहे थे! बातों ही बातों में आरक्षण पर चर्चा चल पड़ी! यही चर्चा आगे बढ़ कर अच्छी-खासी बहस में तब्दील हो गई! एक शर्मा कह रहा था- " आरक्षण बेहद गंभीर बीमारी से भी घातक है, समय रहते सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो देश की स्थिति और भी बद से बदतर हो जाएगी! " दूसरा शर्मा भी कहाँ चुप रहने वाला था, 90 प्रतिशत  अंक लेने  के बाद भी उनका सुपुत्र इंजीनियर नहीं बन पाया था और इसी आरक्षण की बदौलत 45 फीसदी अंक वाला बाज़ी मार गया था! उन्होंने अपनी खीझ निकलते हुए सवाल किया - " आखिर अवसरों की गैर-बराबरी कब तक चलेगी…??? "  तीसरे शर्मा से भी नहीं रहा गया! वो कहने लगा- " आरक्षण तो संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य प्राप्ति का एक साधन मात्र है, जिसका दुष्परिणाम भी सामने हैं! आरक्षण, कुशलता और उत्कृष्टता पर सीधा हमला ही तो है! प्रतिभा पलायन का प्रमुख कारण है! हमारे देश की  प्रतिभाएं विदेशों में खून-पसीना बहाने लगी हैं! देश सेवा की बजाय विदेश सेवा में जुटीं हैं! देश में सिविल सेवाओं की गिरती गुणवत्ता का कारण भी यही आरक्षण है!" इतना सुनते ही चौथे शर्मा के गुस्से का पारा चढ़ गया! कहने लगा-" समाज के हशियाग्रस्त लोगों को अपनी स्थिति बनाने एक सफल प्रयोग है आरक्षण! "  'आरक्षण की वज़ह से जिन लोगों की जिंदगी हाशिये पर आ गई है उनका क्या…?' के सवाल पर तो वो और भी भड़क कर कहने लगा- ' चुप करो...! तुम सब निर्धन, दलित, शोषित, पीड़ित विरोधी हो! उठा और बुदबुदाते हुए वहां से चलता बना! तीनों को चौथे का अचानक भड़कना समझ नहीं आया पर बाद में पता चला कि वो चौथा शर्मा नहीं बल्कि उनका नाम 'शर्मा' था...!!! 

Tuesday, 27 May 2014

" बजारनामा ....!!! "

 " हाथ ठेले में सब्जियां भरकर " टमाटर, धनिया, मिर्ची, गोभी, भिन्डी, भटा, बरबट्टी वाले...!!! " गलियों में चिल्लाते पहुंचने वाले के पास से ही तकरीबन सप्ताहभर से सब्जियां खरीद कर काम चल रहा था! दरअसल बाजार जाने की मेरी कोताही के चलते ऐसा हो रहा था! घर में आज पूर्वान्ह  जल्दी उठाकर मुझे थैला थमा ही दिया गया! बे-मन गोलबाजार पहुंचा और सब्जियां खरीदने लगा! बाजू में किशोरवय की तीन लड़कियों में से एक ने सब्जी वाले से पूछा- 'टमाटर कैसे दिए...???'  सब्जी वाले ने कहा- ' बीस रुपये किलो…!!!'  ' बाबाजी का ठुल्लू बीस रुपये…! दाम कम हो गया है समझे...!' कहकर खी...खी...खी... करते आगे बढ़ गई! मै सब्जी वाले को और सब्जी वाला मुझे देखते रह गया! ये कैसी संस्कृति और कैसा असर मित्रों....??? "