Monday, 11 June 2012

" घुग्घी मां की जय हो.."

एक गाँव..., गाँव की सकरी गली...,गली में करीब चार कमरों का कवेलूदार मकान. बीच का बड़ा कमरा सजा हुआ  था. देवी-देवताओं की तस्वीर के साथ ही नीबू- नारियल का एक तरह से भंडार था वह कमरा. पूजा स्थल से लगाकर एक ऊँची गद्दी लगी थी. उस गद्दी पर बड़ी-बड़ी आखों वाली एक ऐसी महिला बैठी थी जिसके बाल ऐंठनदार थे. भरा हुआ शरीर, ललाट में लाल मोटा और लम्बा तिलक, झक सफ़ेद साड़ी (बाबाओ के बाप के बाप की मां कहलाने वाली मुंबई की ' राधे मां ' की तरह दुल्हन का लिबास नहीं ) उसे और भी भयानक रूप देने अपने आप में पर्याप्त थी. दो सेवक उनकी सेवा में झूल रहे थे. लोग उसे पूरी श्रद्धा से ' घुग्घी मां ' ( उल्लू के सामान बड़ी-बड़ी आंखों के कारण )बुलाते हैं. लोगों का आना-जाना प्राय: लगा रहता है. बदहवास सी एक लड़की को उनके घर के लोग ले आये थे. पता नहीं उस लड़की को क्या तकलीफ थी कि बस बडबड करने लगी थी. सभी ने पहले ' घुग्घी मां ' के चरण छुए फिर देवी-देवताओं की तस्वीर सहित नीबू-नारियल के आगे मत्था टेके. सब के साथ मैने भी वहां अपना शीश नवाया. ऊपर से नीचे तक एक भरपूर नजर मारकर  ' घुग्घी मां ' लड़की के परिजनों की ओर मुखातिब हो गई. पूछा " क्या तकलीफ है बच्चा..?" घर वालों ने बताया " बस रात से खाली बडबड  किये जा रही है. कुछ खा-पी भी नहीं रही है. इसे तो बस आप ही ठीक कर सकती हैं घुग्घी मां."  इतने में  पता नहीं क्या इशारा हुआ तो एक सेवक बाल्टीभर पानी लाकर लड़की के शरीर में उड़ेल दिया. लड़की और जोर-जोर से बडबड करती कूदने-नाचने लगी. एक सेवक " शिव शम्भू ...शिव शम्भू " चिल्लाते आया और लड़की को कस के अपनी बाहों में जकड़ लिया. देवस्थल के धुएं से उसके शरीर की  पूरी सिकाई हुई. ' घुग्घी मां ' ने अपने पास रखे भभूत उसे खाने दिया. करीब घंटेभर बाद लड़की एकदम सामान्य हो गई. उनके घर के लोग "  घुग्घी मां की जय हो...घुग्घी मां की जय हो... " कहते भेंट-चढ़ावा बाद लौट गए.एक दिन वही ' घुग्घी मां ' मुझे एक बड़ी दवा दूकान में दिख गई. उसके साथ एक महिला और एक पुरुष सेवक भी नजर आये. मैने देखा, वो बुखार और दर्द निवारक गोलियों का जखीरा खरीद रही थी. मैने कहा- "  घुग्घी मां की जय हो.."   ' घुग्घी मां ' ने एक प्यारी सी मुस्कान बिखेर दी. उनके सेवकों ने भी कहा- "  घुग्घी मां की जय हो.." मैने पूछा-" आप इन दवाओं का क्या करेंगी..? " घूरती नज़रों ने मुझसे कहा- " क्यों टाइम ख़राब कर रहा है बच्चा, जा तू भी अपना काम कर, हमें भी अपना काम करने दे. " मैने कहा- "  घुग्घी मां " मै तो बस यूँ ही ...." बात ख़त्म हुई नहीं इसके पहले ही बिफरते स्वर मेरे कानों में गूंजने लगे- " इस देश में जब समोसा खिलाकर बच्चे पैदा करवाए जा सकते हैं...., लाल और हरी चटनी से लोगों पर कृपा बरस सकती है तो मेरे ' भभूत ' से क्या कुछ नहीं हो सकता.? " दुकानदार मेरी ओर " क्यों दुकानदारी ख़राब कर रहा है यार की मानसिकता में " देख रहा था.    

Friday, 8 June 2012

'सत्ता' और 'सेना' की संस्कृति

बड़ी खुरदरी खादी की कमीज और खादी का ही पैजामा पहनता है वो. कम से कम दो दिन तो कपड़ा चल ही जाता है लेकिन बीते दो दिनों में उसे कई बार अपने कपडे बदलने पड़ गए.छींक आई तो कपड़ा ख़राब...खांसी आई तो कपड़ा ख़राब. और तो और डकार आने पर भी वही हाल.  रामगुलाम काफी परेशान था. बार-बार दस्त और भूख न लगने की उसे शिकायत थी. घर वालों की सलाह पर उसने एक क्लीनिक की ओर रुख किया. वहां एक आलीशान टेबल लगी थी. उसमे बहुत सारा सामान बिल्कुल व्यवस्थित रखा हुआ था. सामने की कुर्सी में बैठा शख्स अपने गले में नब्ज़ और धड़कन टटोलने वाला यंत्र (स्थेटिस्कोप ) लटका रखा था. मरीज को  देखकर लग रहा था कि उसके शरीर में खून ही नहीं है. पूरा हड्डी का ढांचा लग रहा था वो.उसकी जाँच शुरू हुई. एक तेज रौशनी वाला टार्च जलाकर डाक्टर बोला- मुँह खोलकर फीधे आफ़मान की ओर देखो. जीब दिखाओ. फ़मफ्या क्या है...? फमयबद्ध भोजन  करते हो...? फ़राब पीते हो क्या..? किफ़ी फमारोह के फमागम में तो नहीं गए थे..? रामगुलाम ने सवालों के  यथायोग्य जवाब देते हुए दस्त न होने और भूख न लगने की परेशानी बताई. जाँच-परीक्षण बाद डाक्टर ने कहा- " एक-एक गोली फुबह-फ़ाम खाना. ब्लड प्रेफ़र और फुगर की जाँच करवा लेना. अब  फ़राब का फ़ौक मत पालना. इफ फीफी में मधुरफ है, इसे फ़रबत फ़मझ के मत पी जाना. दवा की खुराक के फाथ दो-दो चम्मच पीते जाना.  दवा खाने और परहेज के बाद भी फेहत में कोई फुधार न दिखे, और कोई फमफ्या खड़ी हो जाये तो पूरी फ़ीफ़ के फाथ और आ जाना. रामगुलाम जम्हाई लेने लग गया. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. इतने में " ही...ही...ही...ही...ही..." हंसी की आवाज आई.   पीछे खड़ा क्लीनिक का सेवक  हंस रहा था. सौ का फ़ीस देकर जब रामगुलाम क्लीनिक से जाने लगा तो सेवक ने कहा -" ऐसा ही होता है. यहाँ जो एक बार आता है वो दुबारा नहीं आता. कुछ समझ में नहीं आया न, दरअसल साहब ' स ' को ' फ ' बोलते हैं."  बताते चलें, एक बार प्रशासनिक ओहदे के अफसर के घर उनके रिश्तेदार के साथ जाना हुआ. बड़ा बंगला था. बड़ा सा फाटक लगा था. दरबान अपनी ड्यूटी बजा रहा था. लाँन से लगा गार्डन हरे-भरे पौधे और फूलों से सजा हुआ था. पोर्च में पीली बत्ती वाली गाड़ी खड़ी थी. हम समझ गए कि साहब घर पर ही हैं.सूचना हुई, बुलावा आया और हम वहां पहुचे. चूँकि मेरे साथ वाला उनका रिश्तेदार था इसलिए स्वागत  भी अच्छा हुआ. नाश्ता आया फिर चाय आई. दोनों में लम्बी घरेलू बातें होती रही तब तक मै गुटखा चबाते लाँन में टहलता रहा. मै लौटा तब तक बातें चल ही रही थी. साहब कह रहे थे- "तुम तो जानते हो, मेरी माँ ने मुझे 'सेना' बेच-बेचकर पढाया-लिखाया है. आज उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि मै इस जगह पर हूँ"  इस बीच साहब की बेटी कहीं जाने निकल रही थी. उसे देख  साहब कहने लगे-"बेटा, जून का महीना है, घूप तेज है, कपड़ा तो रख ही लो और इनदिनों अब दोपहर के बाद जब भी निकलो 'सत्ता' जरुर रखो." वहां  से विदा हो जब हम जाने लगे तो मैने अपनी जिज्ञासा शांत करने साथ वाले मित्र से कहा- यार, ये पढाई-लिखाई के साथ 'सेना' और जून का महीना और धूप के साथ 'सत्ता' का क्या सम्बन्ध है?" जवाब आया- " असल में साहब छेना को 'सेना' और छत्ता को  'सत्ता' बोलते है."    

Saturday, 2 June 2012

चूभती हंसी....!

" बातों से लग तो पूरा संपादक रहे हो लेकिन संपादकों सी मक्कारी कहाँ से लाओगे. हाँ....हाँ..( राजेश शर्मा ) बिल्कुल यही नाम था उस मक्कार का. विज्ञापनों में कहीं कोई कमी नहीं की. जगह-जगह उसने स्कूल खोला. लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने शक्तिमान (मुकेश खन्ना ) और बालीवुड कलाकार ( गुफी पेंटल ) को खुली जीप में गली- गली घुमाया. एक लाख एकमुश्त लेकर मेरे बच्चे की बारहवीं तक शिक्षा की गारंटी दी थी. मेरे जैसे न जाने और कितने छत्तीसगढ़ियों से अरबों वसूला. एक दैनिक अखबार (नेशनल लुक ) भी निकला जो हमारे एक पूर्व संसद की तरह बड़ी तेजी से उभरा था. समाचार लिखने वाले नौकरों ( साँरी  रिपोर्टरों  ) को दोगुनी-तिगुनी मजदूरी में बड़े अखबार ग्रुप से तोड़कर लगाया. बाद में ये ' घर के रहे न घाट के ' वाली स्थिति में आ गए. ' डाल्फिन ' को तो उसने बिना पानी के सागर में तैरने छोड़ दिया और पूरी झांकी के साथ ' नॅशनल लुक ' निकालने वाला अब लुका-छिपी का खेल, खेल रहा है."  एक साँस में वह न जाने और क्या-क्या बके जा रहा था. शायद मैंने यह कहकर उसकी दुखती रग को छेड़ दिया था कि मै भी अब अखबार निकालुंगा और नाम होगा " गोबर टाइम्स." एक पुराने मित्र टिलेश्वर (हम आज भी उसे टिल्लू बुलाते हैं ) से आज स्टेशन में अचानक मुलाकात हो गई. वो मंत्रालय में अपनी ड्यूटी बजाता है. बच्चों की छुट्टी चल रही है. इन दिनों फेमिली के पास रहने उसे अप-डाउन करना पड़ रहा है. उसने सवाल किया- " ये अचानक अखबार निकलने का कैसे सोंच लिया? मैंने कहा-  " ताकि मै देश के लोकतंत्र की ईमारत को मजबूत,चिरस्थाई, ईमानदार और पारदर्शी बनाने में अपना योगदान दे सकूँ. 'गोबर टाइम्स' के माध्यम से सच को सच कहने का प्रयास करूँगा. लोगों की आवाज बनूँगा. समाज को नई दिशा देने की कोशिश होगी." इतना कहते देर न लगी कि टिल्लू की उपहासजनक हंसी से स्टेशन परिसर गूंजने लगा. सुई की भांति चूभन वाली हंसी का अहसास कर मुझे लगा की शायद मेरे सहनाम वाले की करनी का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ रहा है. हम वहां से निकल पाते, इसके पहले एक लाठी टेकती बुढिया " सीढ़ी पार करवा दे बेटा " कहते पहुंची. हम दोनों ने मिलकर माताराम को हांथों का क्षणिक सहारा दिया. उनका धन्यवाद् बटोरकर हम दोनों भी अपने-अपने रस्ते हो लिए.