Wednesday, 25 April 2012

मै क्यों बताऊँ ?

शहर के मध्य एक चौक है. लोग इसे भदौरिया चौक के नाम से जानते है. इसी चौक के बाजू में एक चाय का होटल है. चाय की तलब लगी. मै भी उस होटल तक पहुँच गया. वैसे यहाँ असामान्य व्यक्ति ज्यादा दिखते  हैं. मैने होटल वाले से चाय मांगी. चाय मुझे मिल पाती, इसके पहले उस व्यक्ति पर मेरी नज़र पड़ी जो हाथ में अखबार लिए, उसमे छपे समाचारों को जोर-जोर से पढ़कर लोगों को सुना रहा था. मैने उससे पूछा-" कौन सा अखबार है?" उसने चेहरा घुमाकर आँखें दूसरी ओर कर ली.( जैसे उसके अपने काम से शायद खलल पड़ी हो) उनकी ओर से कोई जवाब तो नहीं आया पर वो जारी रहा. उसमे छपी एक खबर को वह चटखारे ले-लेकर लोगों को बता रहा था. मैने भी सुनी.  खबर थी-"...और जीत गई जिंदगी." खबर का सार यह था कि एक युवक ने अपने घर के कमरे में लगे पंखे के सहारे फंसी लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया. जैसे ही वह उसमे झूलने की कोशिश की, रस्सी टूट गई और मौत ने उसे धोखा दे दिया. इस तरह से जिंदगी जीत गई और मौत को शिकस्त मिली." इस बीच मेरी चाय भी आ गई और मै चुस्कियां लेने लगा. वो अब मेरी ओर मुखातिब होते हुए प्रतिप्रश्न किया-" हाँ भईया, क्या कह रहे थे?" मैने उससे फिर पूछा-" कौन सा अखबार है?" जवाब आया-" भास्कर भूमि." मैने कहा- " कहाँ से निकलता है." उसने अखबार का आखरी पन्ना पढ़कर बताया-" भईया, इसमे तो 'कौरिनभांटा रोड, बाबा फतेसिंग हाल के सामने हरिओम काम्पलेक्स' से प्रकाशित लिखा है" हमारी बातचीत चल ही रही थी कि होटल के पीछे से "ये तो बनारस का रसगुल्ला है, ये तो चिकनी ज़लेबी है,  अरे ये तो इलाहाबाद की रबडी है भाई." की आने वाली जोर की आवाज़ ने हम सब ध्यान खींच लिया.उस होटल में कई दर्ज़न लोग नियमित चाय-नाश्ता करते है. आवाज़ की दिशा में नज़रें दौड़ाई तो कुछ लोगों को गोल घेरे में बैठे देखा. हर कश में ऐसी आवाज़ निकल रही थी.  उनमें से एक को तो मै जानता हूँ. बीडी..सिगरेट...तम्बाखू को तो वह हाथ तक नहीं लगाता लेकिन गांजे की चिलम (सुट्टा ) फूंके बिना वह घर से नहीं निकलता. दिखने में तो एकदम गऊ पर सियार की धूर्तता है उसके अन्दर. दरअसल उसी ने वहां अपनी महफ़िल जमाई थी. वहां खूब हल्ला-गुल्ला हो रहा था. शरीर में पहने हुए कपड़ों के आलावा उसके गले में एक अंगोछा लटक रहा था. वहां से उठकर उसी अंगोछे से अपना मुंह पोछते हुए होटल पहुंचा. गरम चाय, एक घूंट में ही गटकने के बाद बाजू के ठेले में पान खाया. चौक तक जाकर प्रतीक्षा सीट में बैठ गया. पान की पीक उसने सामने के बोर्ड में उड़ेल दी. मैने सब देखा. पर मै किसी को उसका नाम क्यों बताऊँ? दो सौ चक्कर काटकर मुझे नहीं चाहिए दो सौ रुपये.  

Monday, 23 April 2012

'शाहरुख' के 'दर्द' का एहसास



दोस्तों  की जिद्द पर मै  भी चार पहिया की एक सीट में समा गया. कार सीधे राजधानी की ओर फर्राटे भरने लगी. शिवनाथ पुल पार करें और पुलगांव के पहले ठाकुर ठेला में न रुकें, ऐसा संभव नहीं. चाय-नाश्ते के बाद आगे निकले तो कार सीधे रायपुर रिंगरोड होकर 'मेंगनेटो' में रुकी. हम कार समेत मॉल के आधारतल में पहुँच गए क्योकि पार्किंग व्यवस्था वहीँ थी. वहां से उत्तोलक (लिफ्ट) माध्यम से एक, दो करके तीसरे माले पर पहुंचे. एक गार्ड वहां हम सब की जेबें टटोलने लगा. बड़ा अटपटा लगा. हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे. गार्ड ने बड़े अदब से 'सिक्युरिटी रीज़न बौस' कह कर अपना काम कर लिया. हम वहां रनिंग लेडर (चलने वाली आटोमेटिक सीढ़ी) से चढ़ते-उतरते घूमते रहे. 'सुई' से 'सब्बल'  और 'नमक' से 'मुरब्बा' तक की दुकान वहां सजी थी. दोस्तों की इच्छा अब वहां आलीशान टाकीज में फिल्म देखने की हुई. साथ थे, इसलिए न चाहते हुए भी घुसना पड़ा.टिकट लेकर अन्दर जा ही रहे थे कि सामने एक सिक्युरिटी फ्रेम दिखा. उसमे से होकर गुज़र ही रहा था कि फिर एक बार मेरी जेब टटोली जाने लगी. इस बार मुझे स्वाभाविकतौर पर गुस्सा आया. मैंने गार्ड से कहा-" न तो ये न्यूयार्क का हवाई अड्डा है और न मै शाहरुख खान, फिर क्यों है ये ताम-झाम ?" गार्ड हाज़िर जवाब निकला. कहने लगा- " भईया, शाहरुख़, सलमान, या फिर आमिर खान ही क्यों न हो, चेहरा देखनेमात्र से किसी के निर्दोष होने का प्रमाण मिल जाता तो बात ही क्या है." हमारी इस बातचीत का आजू-बाजू वालो ने ठाहकेदार मज़ा ज़रूर लिया पर गार्ड का ज़वाब मुझे कई बातों पर सोचनें मज़बूर कर दिया. हम मॉल संस्कृति में चार से पांच घंटे तक समाये रहे. लौटते वक्त दोस्तों की इच्छा शेर-भालू देखने की हुई. कहते हैं  "शेर देखना भी है और डर भी लगता है तो जंगल नहीं जाना , किसी पिंजरे के शेर को देख लेना  चाहिए" सो हम सीधे भिलाई के मैत्री गार्डन पहुँच गए. शेर पिंज़रे में फलाहार कर रहा होगा और भालू की बदबू से मै पहले से ही वाकिफ था, इसलिए दोस्तों ने शेर-भालू देखा, तब तक मै पेड़ की  एक शाखा में आराम फरमाते रहा पर चैन नहीं मिल पाया. शाहरुख खान को तो अमरीका के एक हवाई अड्डे में महज़ कुछ घंटे रोका गया, मेरी तो अपने ही प्रदेश की राजधानी में खुलेआम जेबें टटोली गई. शाहरुख़ इतने महान कलाकार, उनके आगे मेरी क्या बिसात पर मुझे गुस्सा आ सकता है तो उनके दर्द का एहसास तो मै कर ही सकता हूँ. पेड़ की शाखा में लेटे-लेटे मै सोचने लगा था कि जब ताज पर तांडव हो सकता है, संसद पर हमला हो सकता  है, न्यायलय परिसर में विस्फोट हो सकता है, संसद के अन्दर नोटों की गड्डियां उछालने वालों का सम्मान होता हो और सलाखों के पीछे का आदमी जहाँ मंत्री बन जाता हो, ऐसा  देश अपने आप में महान है. जिस प्रदेश में कलेक्टर दिन-दहाड़े अगवा कर लिए जाते हों वहां इतनी सतर्कता और सजगता तो होनी ही चाहिए.दोस्तों की आवाज़ से मेरी एकाग्रता भंग हो गई, इसी के साथ मै पेड़ की शाखा से उतर गया.  हम लौट आये. जय हिंद.... जय भारत....जय छत्तीसगढ़....कह कर मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया.  














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Tuesday, 10 April 2012

व्यवस्था है भाई, चलने दो........

कहते हैं, कहावतें सागर में गागर भरने जैसा कार्य करती हैं. वाक्य को सुन्दर और महत्वपूर्ण बना देती हैं बशर्ते कि सही कहावत सही समय पर इस्तेमाल की जाये. आज मैं अपने ज्ञान भंडार को टटोलते हुए एक पुरानी कहावत " मच क्राई एंड लिटिल वुल " यानि ऊँची दुकान , फीके पकवान " पर जा अटका. वैसे इस कहावत का इस्तेमाल तब किया जाता है जब जहां से जैसी अपेक्षा होती है वहां से उन अपेक्षाओं की पूर्ति में कमी रह जाती है. किन्तु सच मानिये कि सरकारी दुकानदारी के सम्बन्ध में यह कहावत फेल है. बाज़ार में तेजी-मंदी का दौर चलता होगा पर सरकारी दुकानदारी हमेशा गर्म रहती है. खाने-खिलाने की परंपरा है. जितनी ऊँची दुकान उतने ही मीठे पकवान खिलाने पड़ते है. कुछ को खाने में तो कुछ लोगों को खिलाने में मज़ा आता है. खिलाने वाले अपने सामर्थ्य के अनुसार " खजानी " ( मानव मंदिर वाला नमकीन नहीं ) लेकर चलते है. कई बार तो सरकारी दुकान अचानक चलित हो जाती है और दुकानदार खुद चलकर खाने आ जाता है. यह खिलाने वाले की कूबत पर निर्भर करता है. खाने वालों का छोटा-बड़ा मुंह हमेशा खुला रहता है. व्यवस्था है भाई, क्या करोगे. पेट भरे न भरे पर खाना और खिलाना ज़रूरी है. पेटू व्यवस्था की यही रीति है. बात जब खाने-खिलाने की निकल ही गई है तो इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि कुछ लोगों की सिर्फ विशेष चीज़ ही खिलाने की आदत होती है. कोई अपनी जेब में काजू-किसमिस भरकर निकालता है तो कोई चाकलेट -पीपरमेंट. जितने लोग मिले, सबको बांटना इनकी फितरत में होता है. आपको भले ही कस के भूख लगी हो, सामने वाला जबरदस्ती सौंफ खिलाने का प्रयास करेगा. किसी-किसी को लौंग खाने की आदत होती है. अपनी इस आदत को लोगों पर थोपने से भी ऐसे लोग पहरेज़ नहीं करते. भले ही आपको पसंद न हो पर लौंग पेश करते हुए सामने वाला ऐसा स्नेह उडेलेगा कि खाओ न खाओ, बाद की बात है पर स्वीकारना औपचारिक मज़बूरी हो जाती है. इस तरह का स्नेह उड़ेलने वाले यह भी नहीं देखते कि वो कहाँ, किसलिए पहुंचे है. अभी दो दिन पहले एक सज्जन स्वर्ग सिधार गए. अंतिम यात्रा निकली. जहां तक पहुँचाना था, पहुंची. दाह संस्कार कि तैयारी चल रही थी. एक सज्जन ने आकर मुझसे हाथ मिलाया. प्यार भरी मुस्कराहट छोड़ते हुए वह अगले से मिलाने चला पर मेरे हाथ में सुनहरा रैपर वाला पीपरमेंट छोड़ गया. मै सोंचने लगा, यह भी व्यवस्था का एक हिस्सा है भाई, चलने दो.