Sunday, 22 January 2012

लाल सांड निकला दस हजारी..




बिना दुन्दुभी बजे आज सुबह दो सांड में जंग छिड़ गई. इस बीच कोई गाय दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रही थी किन्तु ये सांड  पता नहीं किस बात से  एक दूसरे पर गुस्सा करते हुए अचानक भिड गए थे. ज़गह ऐसी थी कि दोनों लड़ाई छोड़ भाग नहीं सकते थे इसलिये घेरे में ही रहकर लड़ना दोनों की मज़बूरी हो गई थी. सैकड़ों की संख्या में सोमवार २३ जनवरी की सुबह नौ बजे से नगर  के जय स्तम्भ चौक में करीब दो घंटे तक लोगों ने इन सांडों  की लड़ाई का भरपूर आनन्द उठाया. इस लड़ाई में एक अवसर ऐसा भी आया कि इनमें से लाल वाला सांड उछलकर पार्किंग के घेरे का दायरा लांघने का प्रयास भी किया किन्तु तमाशबीनों ने सांड के प्रयास को असफल बना दिया. इसी लाल सांड पर एक सेठ मित्र ने अगले के साथ दस हज़ार रुपये का दांव लगा दिया था. लड़ते-लड़ते ज़ब लाल सांड एक बार भागने लगा था तो दांव लगाने वाले की घिग्घी बंद होने लगी थी.  भोलेनाथ ने अंतत:  उसका साथ दिया,  कुछ देर की लड़ाई और चली..फिर अब की बार लाल वाला नहीं बल्कि चितकबरा सांड उलटे पांव भाग खड़ा हुआ. इस तरह से लाल वाला सांड दस हजारी निकला. दांव लगाने वाला तो दस हज़ार पा गया पर सांडों की लड़ाई थम नहीं पाई. जय स्तम्भ चौक से पुनः चितकबरे के पीछे भागते हुए लाल सांड ने उसे मानव मंदिर के पास रोक लिया.इसी दौरान भीड़ से " शांत हो जाओ भोलेनाथ.....शांत " की आवाज़ भी आने लगी थी.   कुछ  देर की लड़ाई बाद ये सांड  पीछे ' बग्गा ' गांजा गली होते हुए पुराना अस्पताल रोड पहुँच गए. सांडों के पीछे जय स्तम्भ की पूरी भीड़ चल रही थी. कोई, " खेलने दो- खेलने दो" चिल्ला रहा था, कोई डंडा लहरा रहा था तो कोई इन पर गिलास-गिलास पानी फेंक रहा था. तकरीबन बीस से पच्चीस मिनट तक इनकी जंग और चली. लोगों ने भरपूर मज़ा लिया. सांडो की लड़ाई समाप्त होने के बाद धीरे से भीड़ भी छंट गई.

Saturday, 7 January 2012

यहाँ भी " चूहे-बिल्ली " का खेल ...?

शनिवार 7 जनवरी को मुझे भी सिटी हास्पिटल जाना पढ़ गया. शाम का समय था. शाम इसलिए कि डाक्टर साहब राजनंदगांव के मरीजों को शाम-रात को ही देखते है. वहां  काउंटर में दो से तीन कर्मी बैठे थे. गाने वाला एक चेनल टीवी पर चल रहा था. डाक्टर के आगमन के इंतजार में और भी ढेरों लोग बैठे थे. एक मोटा आदमी वहां रखी क्वाइन बॉक्स वाली मशीन में सिक्के डाल-डाल कर अपना वज़न आजमा रहा था. एक ही व्यक्ति का तकरीबन कुछ समयांतराल में अलग-अलग वज़न का टोकन निकलने से वह परेशान सा हो गया था. पहली बार 95  किलो...दूसरी बार के प्रयास में तीन किलो वज़न घट गया. तीसरी बार तो हद ही हो गई. एक किलो और घट गया. इस तरह  से तीन सिक्के हज़म करने के बाद उस मशीन ने घटतेक्रम में वज़न बताया. जब उस मोटे आदमी ने वहां बैठे और लोगों को मशीन से क्रमवार निकले वज़न के आंकड़ों का परिणाम बताया तो सब खिलखिलाकर हंस पड़े. वज़न घटाने हजारों रुपये माह में फूंक देने वालों की खुशफहमी के लिए शायद ऐसी मशीन कारगर हो सकती है. इस ठहाकेदार वाकिये के बाद सब डाक्टर के आने की राह  देख ही रहे थे कि वेटिंग हाल में कहीं से फुदकता हुआ एक छोटा चूहा आया. बिल्ली की " गिद्ध दृष्टि  " शायद उस पर पहले से ही पड़ गई थी.बिल्ली ने  एक झपट्टा मारकर उसे अपने पंजे में जकड लिया. कुछ देर पंजे में ही दबोचे  रखने के बाद छोटे चूहे को सीधे अपने जबड़े में दबाकर बिल्ली उसे अधमरा करने लगी. यह सब नज़ारा वहां जितने लोग बैठे थे, सब ने देखा. काउंटर में बैठी एक महिला अटेंडेंट को उस छोटे चूहे पर तरस आने लगी.भावावेश में बिल्ली के मुंह से चूहा छुड़वाने का प्रयास करने लगी. एक बार उसे इस प्रयास में सफलता भी मिलती नज़र आई. बिल्ली के मुंह से छूटकर छोटा चूहा फिर वहां  फुदकने लगा था पर उसका दुर्भाग्य कि वह दोबारा बिल्ली के पंजे में कैद होकर रह गया . सब की  नज़रों के सामने से बिल्ली अपना शिकार लेकर बाहर एकांतवास में चली गई. डाक्टर के आने तक इसकी चर्चा चलते रही. कोई चूहे को बेचारा कहकर शोक मना रहा था तो कोई इकोलाजिकल सिस्टम बता रहा था.